अंग्रेज़ी से अनुवाद : गीत चतुर्वेदी
आमतौर पर जब खान-पान से जुड़ी चीज़ों की बात निकलती है, तो उससे जुड़ी होती हैं स्वाद की पुरानी स्मृतियॉं, मसालों की सुगंध, त्योहारों या मौसम से जुड़े खाद्य-पदार्थ या उस खाने को बनाने वाला शख़्स, जोकि अमूमन मॉं या दादी मॉं होती हैं। चाहे असल जीवन हो या कहानी, अधिकतर पतियों की शिकायत यह होती है, ‘इस खाने में वह स्वाद नहीं है, जो मेरी मॉं के बनाए खाने में होता था।’ तमिल परिवारों में इसे आमतौर पर ‘काई मानम’ या ‘हाथ की ख़ुशबू’ कहते हैं, जोकि हर किसी की क़िस्मत में नहीं होता। यह प्रकृति द्वारा दी गई एक भेंट है। खान-पान से जुड़ी मेरी यादें केवल इन्हीं बातों से नहीं, बल्कि इस बात से भी जुड़ी हैं कि मेरी मॉं अलमेलु, जिन्हें प्यार से ‘अलामु’ पुकारा जाता था, खाने को एक विचार मानती थीं। उनके लिए खाने का अर्थ यह नहीं था कि किन्हीं ख़ास मौक़ों पर छोटी प्याज़ से, या बाक़ी दिनों में सहजन, कद्दू, मूली, अरबी या मात्र दाल की बड़ियों के सहारे सांभर बना दिया जाए, जिसमें नारियल और मसालों का पेस्ट डालकर सरसों, मेथी और लाल मिर्च का तड़का लगाया जाए (सांभर में तड़के के लिए हमेशा तिल के तेल का इस्तेमाल होता था); या फिर बारह अलग-अलग तरह के रसम बना दिए जाऍं; और बिसि बेले भात और कोसांबरी की तो बात ही छोड़िए, क्योंकि हम बेंगलुरू में रहते थे। मेरी मॉं के लिए अधिक महत्वपूर्ण था, खाना बनाने की प्रक्रिया।

मेरी मॉं का विवाह 1926 में हुआ, उस समय वह ग्यारह बरस की थीं। जब वह ससुराल आईं, तब लगभग पंद्रह की। वे अपने साथ माता-पिता की दी हुई बहुत सारी चीज़ें लाई थीं, जिनमें ऐसे बर्तन भी शामिल थे, जिनमें उनका घरेलु नाम ‘अलामु’ उकेरा हुआ था। एक विशाल संयुक्त परिवार में, यह अच्छा माना जाता था कि अलग-अलग बहुओं के बर्तनों पर उनके अपने नाम लिखे हों, ताकि भविष्य में किसी क़िस्म के विवाद से बचा जा सके। हमारे घर में जितने बर्तन थे, सभी पर मेरी मॉं का नाम उत्कीर्ण था। मेरी मॉं ने खाना बनाना अपनी सास से सीखा था, जोकि तब विधवा हो गई थीं, जब मेरे पिता लगभग चौदह वर्ष के थे। उन दिनों की प्रथाओं के अनुसार, उनका सिर मुँड़वा दिया गया था और पहनने के लिए गहरे भूरे रंग की नौ गज वाली साड़ी दी गई थी। लेकिन उन्हें एक परिवार का पालन-पोषण भी करना था। उनके दो बड़े बेटे इंजीनियर और वकील के रूप में स्थापित होने का प्रयास कर रहे थे, और दो बेटियों की शादी पहले ही हो चुकी थी। लेकिन उनके तीन बेटे अभी भी पढ़ रहे थे, जिनमें मेरे पिता भी शामिल थे। घर में गाऍं थीं, सो, उन्होंने परिवार चलाने के लिए दूध का व्यवसाय आरंभ कर दिया। इसी उद्यमी और कर्मठ स्त्री से मेरी मॉं ने खाना बनाना सीखा था। इसलिए, खाना बनाने के साथ-साथ उन्हें इस बात का ज्ञान भी मिला कि ईंधन के लिए किस प्रकार की लकड़ी ख़रीदनी चाहिए, कोयले का चूल्हा कैसे बनाना चाहिए, और किस तरह कॉफी बीन्स को भूनकर हर रात ताज़ा-ताज़ा पीसना चाहिए ताकि उससे सुबह की कॉफ़ी बनाई जा सके।

मेरी मॉं ने टिन की एक बाल्टी का इस्तेमाल करके सीमेंट को ढाला और अपने लिए कोयले वाला चूल्हा बनाया था। वह टिन की एक छोटी बाल्टी लेतीं, उसे सीमेंट से भर देतीं, और चूल्हा जलाने के लिए सामने की ओर एक घुमावदार कट बना देतीं। जब सीमेंट सूख जाता, वह बाल्टी हटा लेतीं। एक बार मेरी बड़ी बहन ने उनसे पूछा, ‘अम्मा, सामने वाला घुमावदार कट कितना बड़ा होना चाहिए, यह आप कैसे तय करती हैं?’ मॉं ने उत्तर दिया, ‘इतना बड़ा कि जिसमें तुम्हारा हाथ जा सके।’ हमारे स्टोर रूम की शेल्फ़ पर एक कॉफ़ी ग्राइंडर लगा हुआ था। हर रात, हममें से किसी एक का दायित्व होता कि वह हैंडल घुमाए और उन कॉफ़ी बीन्स को पीसे, जिन्हें मॉं ने बड़े जतन से तलकर एक टिन में रखा होता था। कॉफ़ी का पाउडर, ग्राइंडर के नीचे रखे एक होल्डर में गिरता था, जिसे डाबरा कहते थे। यह भी उतना ही भूरा दिखता, जितना कॉफ़ी पाउडर। जब लोहे की चिमटी से वह कॉफ़ी फिल्टर के ऊपरी हिस्से को टन-टन करके मारतीं, ताकि कॉफ़ी नीचे गिर सके, तब वह आवाज़ सुनकर हम समझ जाते थे कि जागने का समय हो गया है।

हमारे पास तांबे का एक घड़ा था, जिसमें पीने का पानी रखा जाता था। उसे नारियल के रेशों और ईंट के बुरादे से रगड़कर साफ़ किया जाता था, जिस कारण वह हमेशा चमकता रहता था। उसके मुँह पर मेरी मॉं का नाम ‘अलामु’ उत्कीर्ण था। हमारे पास लकड़ी से बना कोझुक्कटाई (मोदक बनाने वाला सॉंचा) था, जिसे मोड़कर रखा जा सकता था। कोझुक्कटाई के लिए आटा तैयार होता : उबलते पानी में चावल का आटा डाला जाता, उसमें थोड़ा-सा तेल डालकर अच्छी तरह मिलाया जाता, और लकड़ी के चम्मच से (अक्सर दही मथने वाली मथानी के पिछले सिरे से) तब तक चलाया जाता, जब तक कि वह गाढ़ा न हो जाए, और फिर उसके बड़े-बड़े गोले बनाकर भाप में पकाया जाता था, और फिर उसमें भरावन के लिए सामग्री, जैसे गुड़ के साथ पका नारियल, दाल का चूरा, जो उड़द की दाल को भिगोकर, हरी मिर्च और अदरक के साथ पीसकर, फिर भाप में पकाकर, हाथों से मसलकर बनाया जाता, फिर उसमें तिल और गुड़ का पाउडर मिलाया जाता। इसके बाद कोझुक्कटाई बनाने का काम शुरू होता। लकड़ी के एक सॉंचे में, जिसके निचले हिस्से में अल्युमिनियम की प्लेट लगी होती, जिसमें आड़ा चीरा लगा होता। उस सॉंचे में भाप में पके हुए उन गोलों को रखा जाता। फिर सॉंचे के हत्थे से उसे धीरे से दबाया जाता, ताकि वे उस पर सपाट होकर फैल जाऍं। फिर उसमें भरावन रखा जाता और सॉंचे को मोड़ दिया जाता। सॉंचे से बाहर लटक रहे अतिरिक्त आटे को हटा दिया जाता था, और जब सॉंचा खुलता, तो देखिए, एक साथ तीन कोझुक्कटाई तैयार। दो सॉंचों की मदद से, एक बार में छह कोझुक्कटाई का सेट तैयार हो जाता। फिर उन्हें इडली बनाने वाले बर्तन में भाप में पकाया जाता। तीन अलग-अलग तरह के भरावन के साथ क़रीब-क़रीब सौ कोझुक्कटाई तो बन ही जाते थे। गणपति की मूर्ति के सामने वे प्रसाद के रूप में देखने-मात्र को रखे जाते थे, क्योंकि उन्हें चट कर जाने के लिए हम चार बच्चे तैयार रहते थे।

इसके अलावा, लकड़ी का एक छोटा-सा स्टूल था, जिसके बीच में एक छेद था। उसमें पीतल का एक सॉंचा लगाया जाता, जिसमें छोटे-छोटे छेद थे। उससे हम चावल के नूडल्स बनाते थे, जिसे सेवईं कहा जाता था। जिस तरह भाप में पके हुए चावल की लोइयॉं कोझुक्कटाई के लिए तैयार की जाती थीं, वैसी ही लोइयॉं पीतल के इस सॉंचे के भीतर भी रखी जाती थीं और फिर उन्हें लकड़ी से ज़ोर से दबाया जाता था। ऐसा करने के बाद वे लोइयॉं नूडल्स में परिवर्तित होकर नीचे रखे बर्तन में गिरती जातीं, गरमा-गरम। कभी-कभी उस प्रेसर को दबाना कठिन हो जाता था। तब मेरी मॉं, मेरे पिता से उसे प्रेस करने को कहतीं। वह चावल कूटने में प्रयुक्त होने वाले लकड़ी के एक मूसल, जिसके एक सिरे पर लोहे की छल्ली लगी होती, को आड़ा करते और उसके दोनों सिरों को पकड़कर उसे प्रेस करते थे। इसके बाद उन नूडल्स में अलग-अलग तरह के स्वाद भरे जाते, जैसे इमली, नींबू, नारियल। उनमें राई, उड़द दाल, चना दाल, और कड़ी पत्तों का तड़का लगाया जाता था और हर स्वादिष्ट व्यंजन के ऊपर भुने हुए काजू सजाए जाते थे।

एक चॉंदी का कटोरा भी था, जिसमें हम बच्चे खाना खाते थे। बड़े होने के दौरान जब कभी हम बीमार पड़ते, उस कटोरे को बाहर निकाला जाता। उसमें गर्म चावल डाला जाता, फिर उसमें घर का बना घी मिलाकर उसे साना जाता, फिर ऊपर से जीरा और काली मिर्च वाला गर्म रसम डालकर मिलाया जाता था; फिर उस कटोरे को बीमार बच्चे के पास लाया जाता, और साथ में खाने के लिए भुना हुआ पापड़ भी दिया जाता। कोई बच्चा नखरे करता, तो मॉं ख़ुद उसे अपने हाथ से खिलाती और नीलांबरी राग में लोरी गाकर सुलातीं।
यह लेख मैंने उन बर्तनों को याद करते हुए लिखना शुरू किया था, जिन पर नाम उत्कीर्ण होते थे। उन दिनों बेंगलुरू में, अमूमन दोपहर के समय, सड़क पर से तमिल भाषा में आवाज़ गूँजती, ‘स्टील पात्रम पेयर पोडाराधु…’ (स्टील के बर्तनों पर नाम खुदवा लो)। ये तमिल भाषी क्षेत्रों से आए कारीगर हुआ करते। उन्हें जो नाम बताया जाता, उसे वे बर्तनों और थालियों पर उत्कीर्ण करते, साथ ही फूलों और मोर या दूसरे पक्षियों का चित्र उकेरकर उसकी सजावट कर देते। मेरी मॉं के पास जितने भी बर्तन थे, कमोबेश सब पर, उनका नाम उत्कीर्ण था। बाद में, जब भी वह नया बर्तन ख़रीदतीं, उस पर इन्हीं भटकते कारीगरों से नाम उत्कीर्ण करवातीं, जिनके पास आमतौर पर कम ही काम रहता था। आजकल बर्तन की दुकानों में नाम उकेरने के लिए जो बिजली की मशीनें प्रयोग की जाती हैं, वे उन कलात्मक कारीगरों के काम के आगे कुछ नहीं। मेरे पास एक ड्रम है, जिस पर मेरी बहन राजेश्वरी का नाम उत्कीर्ण है, और उसके ठीक नीचे एक चिड़िया बनी हुई है। हालॉंकि, अब वह थोड़ी धुँधली पड़ने लगी है।

मेरी मॉं ने मुझे जो व्यंजन बताए हैं, उन्हीं की रेसिपी के हिसाब से मैं खाना बनाती हूँ, लेकिन स्वाद अलग हो जाता है, क्योंकि मेरे पास मेरी मॉं जैसा घर नहीं है, न ही उनके हाथों की सुगंध। जब मेरे पिता बीमार पड़े, तब बेंगलुरू वाला घर ख़ाली कर दिया गया। मॉं अपने साथ, पीतल के बड़े-बड़े ड्रमों को छोड़, बाक़ी के तमाम बर्तन लेती आईं। यह करते हुए उन्होंने मुंबई में रहने वाले अपने बच्चों की ज़रा भी परवाह नहीं की, जो यह बोलते हुए कुढ़ रहे थे कि उनके घरों में इतने बर्तन रखने की जगह नहीं थी। वह अपने साथ लोहे की कड़ाहियॉं भी लेती आईं, जिनके बारे में उन्हें सब याद था कि उन्हें कब और कितने में ख़रीदा गया था। मेरे पास इस समय जो लोहे की कड़ाही है, उसे आठ आने में ख़रीदा गया था। तब मेरी बहन बहुत छोटी थी। पीतल का छोटा-सा बर्तन, जिसमें कभी-कभी तड़का लगाया जाता था, बहुत बाद में बेंगलुरू में लगभग एक रुपए में ख़रीदा गया था। एक बार जब मैं अपने भाई के घर गई थी, तब मॉं ने कहा कि कोई भी तांबे के उस घड़े का, या चावल के नूडल्स बनाने वाली लकड़ी के स्टूल का, या लोहे की गहरी कड़ाही का इस्तेमाल नहीं करना चाहता, जिसमें हम अप्पम नाम के मीठे और नमकीन पकवान बनाया करते थे; फिर उन्होंने पूछा कि क्या मैं इन बर्तनों को अपने घर में रखना चाहूँगी, क्योंकि उन्हें फेंकने का उनका दिल नहीं कर रहा। लकड़ी के उस स्टूल का इस्तेमाल हम बैठने के लिए भी करते थे। हर शुक्रवार, बिला नागा, उसी पर बैठकर मैं और मेरी बहन तेल से नहाते थे; मॉं हमारे बालों में तेल लगाती थीं, रगड़कर मालिश करती थीं। मैंने कहा कि हॉं, मैं इन बर्तनों को अपने घर में रख लूँगी। उन्होंने तांबे का घड़ा, स्टूल और लकड़ी का प्रेस मुझे दे दिया, साथ में लोहे की छल्ली वाला लकड़ी का मूसल भी दे दिया। मैं वह सारा सामान अपने घर लेती आई। जैसे ही मैं घर में घुसी, मेरे पति विष्णु ने पूछा कि यह मूसल किस काम आएगा। मैंने झट से कहा, ‘अपनी सुरक्षा के लिए। देखो, दरवाज़े के पीछे अख़बार में लपेटकर रख दिया है कि कभी कोई चोर घर में घुसने की कोशिश करे या कोई मुझ पर हमला करे, तो उसकी पिटाई के लिए एकदम तैयार।’ मैंने एक बार कोझुक्कटाई बनाने का प्रयास किया था, लेकिन बड़ा बुरा अनुभव रहा। चावल का आटा सॉंचे पर समतल होकर फैला ही नहीं। तब मुझे उसे अपने हाथों से बनाना पड़ा। वह सॉंचा अब भी दीवार पर एक सजावटी सामान की तरह लगा हुआ है। लकड़ी का स्टूल भी वहीं है। एक बार एक विदेशी ने हिचकिचाते हुए पूछा था कि क्या यह बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाली कोई पारंपरिक टॉयलेट सीट है! तांबे का वह घड़ा मेरी खिड़की के पास रखा हुआ है, पूरब की ओर। समुद्र से आने वाली खारी हवाओं के कारण अब वह उतना चमकदार नहीं रहा, जितना हमारे बेंगलुरू वाले घर में हुआ करता था। इसके बाद भी, वह वहीं रखा रहता है और अक्सर मैं उसके मुँह पर उकेरे गए उनके नाम ‘अलामु’ पर उँगली फेरती खड़ी रहती हूँ। अब वह नाम लगभग मिट गया है, लेकिन अलामु का पहला अक्षर “அ” अब भी महसूस किया जा सकता है। वह मुझे मॉं की याद दिलाता है, और उस घर की भी, जिसे उन्होंने खाने-पीने की चीज़ों, भोजन और प्रेम के वातावरण से भर दिया था।

