साँचों का किस्सा<br>Volume 1 | Issue 11 [March 2022]

साँचों का किस्सा
Volume 1 | Issue 11 [March 2022]

आमों का मौसम पूरे शबाब पर था। यह दृश्य उन्हीं दिनों का है। मेरे पति की माँ- बेला, आँगन में बैठी थी और अपने सामने रखे आमों से भरे टोकरे में से एक –एक आम को बड़ी निपुणता से अपने हाथों के बीच दबा दबाकर आमों का रस निकालती जा रही थी। और फिर उस रस को वह तेल चुपड़े मिट्टी के साँचों में ढारती जा रही थी। रस की एक परत के ऊपर वह दूसरी परत जमाती जा रही थी। जब परत ... — कल्याणी दत्ता
लंगर –‘किसान नहीं तो खाना नहीं’ आंदोलन की धड़कन<br>Volume 1 | Issue 10 [February 2022]

लंगर –‘किसान नहीं तो खाना नहीं’ आंदोलन की धड़कन
Volume 1 | Issue 10 [February 2022]

वह 28 अगस्त का दिन था, जब करनाल के पास बस्तारा टोल प्लाज़ा पर किसान इकट्ठा हो हरियाणा के मुख्यमंत्री एम. एल. खट्टर का विरोध कर रहे थे और पुलिस ने उनपर 5 बार लाठी चार्ज किया था।लाठी के ये प्रहार जानलेवा थे। बहुत सारे किसान घायल हुए। उनमें से एक थे 45 वर्षीय सुशील काजल जो पीठ पर अनेक चोटों के साथ घर पहुंचे। मार के कारण उनका पेट भी बुरी तरह सूज गया था... —अमनदीप संधु
रचने वालों के साथ खाना <br>Volume 1 | Issue 9 [January 2022]

रचने वालों के साथ खाना
Volume 1 | Issue 9 [January 2022]

भूली बिसरी घटनाओं को खाने से जुड़ी यादों के साथ दर्शाने वाला सबसे लोकप्रिय साहित्य, शायद उसी किताब में दर्ज है जिसे मार्सल प्रूस्त ने रेमेंबरन्स ऑफ थिंग्स पास्ट  में शिद्दत से अंकित किया है। 19 वीं और 20वीं सदी के शुरुआती दौर में प्रूस्त ने सात खंडों में इस क्लासिक की रचना की। किताब में चार्ल्स स्वान नाम का नायक, एक बार आयताकार टी केक के एक टुकड़े को खाता है, जिसके बारे में विवरण है कि वह मेडेलीन  से बना है जिसे कुछ समय के लिये नींबू के फूलों से बनी चाय में डुबो कर रखा गया था... —जया जेटली
Bhanukul’s Kitchen Raga-Hindi<br>Volume 1 | Issue 8 [December 2021]

Bhanukul’s Kitchen Raga-Hindi
Volume 1 | Issue 8 [December 2021]

एक जानी-मानी कहावत है- सुबह काशी, शामे अवध और शबे मालवा. यह वह भू-भाग है जहाँ की आबो-हवा प्रदेश के दूसरे भागों की तुलना में शीतल, संतुलित और रम्य है. तो मेरा जन्म ऐसे ‘मालवा’ में हुआ जहाँ की काली माटी भरपूर उपजाऊ है साथ में डग-डग पर पानी भी. मैं जिस परिवेश में जन्मी और पली बढ़ी वहाँ चहूँओर स्वर गुंजायमान थे. जिस तरह संगीत के घरानों की खूबियों को सराहा जाता रहा, उसी तरह अलग-अलग संस्कृति के खानपान का भी ऐसा अनूठा संगम रहा, कि क्या कहा जाए… — कलापिनी कोमकली
मेघबालिका की तलाश में<br>Volume 1 | Issue 6 [October 2021]

मेघबालिका की तलाश में
Volume 1 | Issue 6 [October 2021]

मैंने कविता के प्रेम की वजह से उससे शादी की थी और वह कहती थी कि उसने मेरे खाने को लेकर मुझसे शादी की है। उन तमाम लोकल ट्रेन से की गई यात्राओं के दौरान, जो हमने कॉलेज के दिनों में साथ-साथ तय की थीं वह यही बात बार बार कहा करती थी-मेरे खाने का डब्बा, मेरी दूसरी सबसे आकर्षित करने वाली बात थी उसके लिए; और पहली आकर्षित करने वाली बात तो निस्संदेह मेरा उस खाने को अपने हाथों से बनाना था! — अभिषेक मजूमदार
पुडिंग, सलाद और सारू जैसी ज़रूरी बातें <br>Volume 1 | Issue 4 [August 2021]

पुडिंग, सलाद और सारू जैसी ज़रूरी बातें
Volume 1 | Issue 4 [August 2021]

एक बार एक विद्यार्थी गुरूकुल में पढ़ने जाता है। गुरु अपनी पत्नी को निर्देश देते हैं कि उसे सिर्फ चावल और अरंडी का तेल दिया जाये। विद्यार्थी इसे गुरु का आदेश मान भक्त-भाव से ग्रहण करता है... — पुष्पमाला एन.
पांडुलिपियों और बंदूकों की डगर पर रोहू मछली और जलेबी <br>Volume 1 | Issue 3 [July 2021]

पांडुलिपियों और बंदूकों की डगर पर रोहू मछली और जलेबी
Volume 1 | Issue 3 [July 2021]

एक बार एक विद्यार्थी गुरूकुल में पढ़ने जाता है। गुरु अपनी पत्नी को निर्देश देते हैं कि उसे सिर्फ चावल और अरंडी का तेल दिया जाये। विद्यार्थी इसे गुरु का आदेश मान भक्त-भाव से ग्रहण करता है... — आशुतोष भारद्वाज
मुझे खाने के किस्से याद हैं , व्यंजन बनाने की विधियाँ नहीं <br>Volume 1 | Issue 2 [June 2021]

मुझे खाने के किस्से याद हैं , व्यंजन बनाने की विधियाँ नहीं
Volume 1 | Issue 2 [June 2021]

अब जब मैं 70 बरस की हो गई हूँ, तब जाकर मैं खाने का आदर करने लगी हूँ। अब मैं समझ चुकी हूँ कि खाना सिर्फ खाकर निपटाने की चीज़ नहीं है बल्कि उसे खाने के विविध तरीके होते हैं और उसकी मात्रा तथा गुणवत्ता का सही होना, निहायत ज़रूरी है... — Leela Samson
श्री भजहरी राधुनि की कथाएँ <br>Volume 1 | Issue 1 [May 2021]

श्री भजहरी राधुनि की कथाएँ
Volume 1 | Issue 1 [May 2021]

मैं अपने-आप को लेखक नहीं समझता। जैसे खेलते – खेलते लोग खिलाड़ी कहलाने लगते हैं उसी तरह मैं बिन मंशा, बिन पढ़ाई –लिखाई, लिखने लगा और लेखक कहलाया जाने लगा। लेकिन लेखक होने से पहले मैं एक रसोइया था। उससे पहले मैं रिक्शा चलाया करता था और उससे भी पहले… क्या-क्या कहूँ? फेहरिस्त लंबी है। — Manoranjan Byapari
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