एक बेकरीवाले द्वारा भारत में ब्रेड की तलाश
Volume 5 | Issue 10 [February 2026]

आज का लंच कुछ ऐसा था, जिसकी प्रतीक्षा मैं पूरी अधीरता के साथ कर रहा था। कई दिनों से मुझे अपने पसंदीदा ‘तांबड़ा रस्‍से’ का स्‍वाद चखने को नहीं मिला था। यह खाने की वह चीज़ है, जो मेरे मूड को तुरंत अच्‍छा कर देती है। मटन का सबसे नरम टुकड़ा, जो धीरे-धीरे पका हो, मसालों की संगत में पूरी तरह डूबा हुआ, और उस पर महाराष्‍ट्रीयन गोडा मसाला की हल्‍की तीखी सुगंध, सच में ‘शेफ्स किस’ जैसा लगता है। अजीब बात है कि... — जय पॉंचपोर
गुन्‍द्रुक : सिक्किम की स्‍वादिष्‍ट विरासत<br>Volume 5 | Issue 9 [January 2026]

गुन्‍द्रुक : सिक्किम की स्‍वादिष्‍ट विरासत
Volume 5 | Issue 9 [January 2026]

सिक्किम में सर्दियों में भरपूर फसल होती है। गुलाबी-लाल मूली, फूली हुई फूलगोभियॉं, ओस से भीगी हुई-सी पत्‍तागोभियॉं, और मोटी-ताज़ा गाजरें, सब्‍ज़ी की हर दुकान पर आपको लुभाती हैं। इनमें सबसे प्रिय वे हरी पत्‍तेदार सब्‍ज़ि‍यॉं हैं, जिन्‍हें न केवल ताज़ा-ताज़ा खाया जाता है, बल्कि कठिन महीनों के लिए सुरक्षित भी रखा जाता है। इस मौसम में सिक्किम की किसी भी बस्‍ती से गुज़रें, तो आपको धूप में रखी हुई बॉंस की टोकरियॉं दिखाई देंगी, जिनमें ... —खुशी प्रधान
अवियल<br>Volume 5 | Issue 8 [December 2025]

अवियल
Volume 5 | Issue 8 [December 2025]

कृष्‍णामणि अपने एक कमरे वाले साधारण-से मकान के ढँके हुए बरामदे के सबसे बाऍं कोने में बैठा करती थी, बाग़वानी में इस्‍तेमाल होने वाली हँसिया उसकी दाहिनी जॉंघ के ठीक पास होती, ताकि ज़रूरत पड़ने पर वह तुरंत ही उसे उठा सके। लोहे की घुमावदार फाल और उसका लकड़ी का हत्‍था, जो बरसों पकड़े जाने के कारण ख़ासा चिकना हो चुका था, मिट्टी के तेल की ढिबरी की रोशनी में हल्‍का-सा... —एस. सतीश कुमार
भात की घुमक्कड़ ख़ुशबुएं<br>Volume 5 | Issue 7 [November 2025]

भात की घुमक्कड़ ख़ुशबुएं
Volume 5 | Issue 7 [November 2025]

ऊपरी तौर पर देखने में लगता है कि हमारी इस गतिशील सभ्यता के भीतर, हर दिन बस एक ही ढर्रे पर चल रहा है, जबकि जो लोग मानवीय इतिहास की नब्ज़ समझते हैं, उन्हें पता है कि यह जीवन कितना अनूठा है। इसमें हर पल नए मोड़ और अनगिनत बदलाव छिपे हैं। इन बदलती कहानियों में अब सिर्फ़ जज़्बात ही नहीं, बल्कि घर, छाते, कपड़े से लेकर पूरा का पूरा रसोईघर भी एक जीवंत पात्र की तरह शामिल हो चुका है। ये रसोई के ... —अमृता भट्टाचार्या
एटिंग, अपोंग और अन्‍य कहानियाँ <br>Volume 5 | Issue 6 [October 2025]

एटिंग, अपोंग और अन्‍य कहानियाँ
Volume 5 | Issue 6 [October 2025]

खुली आग के ऊपर लोहे की तिपाई है, उस पर एक बड़ा बर्तन रखा हुआ है, सबकी निगाहें उस पर लगी हुई हैं। जब बर्तन खड़खड़ाता है, सब लोग तारीफ़ में आहें भरने लगते हैं। तभी कोई ढक्‍कन पर भारी पत्‍थर रख देता है और खड़खड़ाहट बंद हो जाती है। ‘चलो, पीछे हो जाओ, जाकर सो जाओ।’ मॉं या मौसी की गूँजती हुई आवाज़ हमें दूर भगाने की कोशिश करती है। ऐसे मौक़ों पर हम अपनी सॉंस रोक ... —ममांग दई
प्रोटीन और शहर<br>Volume 5 | Issue 5 [September 2025]

प्रोटीन और शहर
Volume 5 | Issue 5 [September 2025]

आजकल हममें से कुछ लोग अपनी थालियों को जिस तरह देखते हैं, मुझे नहीं याद कि हम कभी उस तरह खाते थे। हम हिसाब लगाते हैं कि हम कितनी कैलरी खा रहे हैं, कितना फाइबर, कितने हेल्‍दी फैट्स या प्रोटीन। प्रोटीन के प्रति जागरूकता की एक लहर सोशल मीडिया के ज़रिए कई लोगों में फैल गई है। कभी बॉडीबिल्‍डरों, खिलाड़‍ियों और न्‍यूट्रिशियनों का शौक़ समझी जाने वाली प्रोटीन की बातें, अब ... —गोपाल एमएस
अहमदाबाद का खान-पान<br>Volume 5 | Issue 1 [May 2025]

अहमदाबाद का खान-पान
Volume 5 | Issue 1 [May 2025]

यह शब्द कई तरीक़ों से बोला जा सकता है; जैसे ‘अगलेस,’ ‘एजलैस,’ ‘एग्‍लेस,’ या ‘एक-लेस,’ इसलिए कानों को ‘एगलेस’ शब्द सहजता से नहीं चुभता। यह सिर्फ़ ‘कम अंडा’ नहीं, बल्कि ‘बिना अंडा’ होता है। मतलब- केक में बिल्कुल अंडा नहीं होना चाहिए। यह बात किसी कुशल रसोइए, बेकिंग के प्रेमी या असली केक पसंद करने वाले को चौंका सकती है। लोग कहते हैं कि ‘एगलेस’ केक देखने में बिल्कुल असली जैसा लगता है, लेकिन केक ख़ुद जानता है कि ... —एस्‍थर डेविड
चाट के बारे में<br>Volume 4 | Issue 12 [April 2025]

चाट के बारे में
Volume 4 | Issue 12 [April 2025]

इंटरनेट पर चाट के बारे में पढ़ना कुछ वैसा ही है, जैसे कोई अपने बचपन की यादों को गूगल मैप पर तलाशने की कोशिश करे। फिर भी, इंटरनेट का उपहास नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसी ने मुझे तीन महत्वपूर्ण जानकारियाँ दीं, जिनसे मेरे स्थानीय चाटवाले और उनके ग्राहक पूरी तरह अनजान हैं। पहली बात यह कि चाट का जन्म उत्तर भारत में सत्रहवीं सदी में हुआ, जब मुग़ल बादशाह शाहजहाँ का... —नीलम शरण गौर
निमतनामा : मालवा के व्यंजन-ग्रंथ से दिलचस्प क़िस्से<br>Volume 4 | Issue 11 [March 2025]

निमतनामा : मालवा के व्यंजन-ग्रंथ से दिलचस्प क़िस्से
Volume 4 | Issue 11 [March 2025]

यह कह सकते हैं कि सुल्तान का दरबार दिखने में असाधारण था। दरबार के दाहिनी ओर पुरुषों जैसे वस्त्रों में सजी तुर्क किशोरियाँ खड़ी थीं। वे संख्या में पाँच सौ थीं और सुल्तान की निजी अंगरक्षक थीं, हाथों में धनुष-बाण लेकर चौकस, तैयार! बिलकुल ऐसी ही पोशाक में पाँच सौ अन्य स्त्रियाँ बाईं ओर खड़ी थीं। लेकिन इन दोनों समूहों में एक बड़ा अंतर था— सुल्तान की बाईं ओर खड़ी स्त्रियाँ अबीसीनिया की थीं और ... —जयिता दास
खेत, खलिहान, समुद्र से थाली तक <br>Volume 4 | Issue 10 [February 2025]

खेत, खलिहान, समुद्र से थाली तक
Volume 4 | Issue 10 [February 2025]

1960 के दशक में गोवा के गाँव प्रकृति के क़रीब होते थे, जो अपने समुदायों को आपसी निर्भरता का पाठ पढ़ाते थे। घर, जीवनशैली, भोजन का उत्पादन और उपभोग- सबमें यह समझ झलकती थी। आज की तेज़ रफ़्तार जीवनशैली में यह सब कठिन लग सकता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन और उसके बढ़ते दुष्प्रभावों को देखते हुए, इस संतुलित जीवन-शैली में गहरी सीख छिपी है। गाँव का रोज़मर्रा का जीवन हाशियों पर दर्ज उन नोट्स से संचालित होता था, जिनमें अकाल, सूखा, महामारी और बाढ़ की यादें सँजोई जाती थीं। मृत्यु और निर्धनता, संपन्न लोगों के लिए भी, जीवन का स्थायी हिस्सा थे। यदि धान की फसल एक-दो मौसम ख़राब हो जाती, तो पूरा संतुलन बिगड़ ... —साविया विएगास
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