অতীতের মধুরতার স্মৃতি: বাঙলার ছাঁচ
Volume 1 | Issue 11 [March 2022]

আমের মৌসুম তখন পুরোদমে চলছে। বেলা, আমার শাশুড়ী, উঠানে এক ঝুড়ি আম নিয়ে বসে ফলের রস এক এক করে ছেঁকে তেল মাখা মাটির ছাঁচে ছড়িয়ে দিচ্ছিলেন। স্তরের পর স্তর রস প্রয়োগ করা হয়েছিল, যতক্ষণ না ছাঁচের উপর আবরণ যথেষ্ট পুরু হয়। তারপর ছাঁচগুলি একটি প্লেটে নামিয়ে , একটি মসলিন কাপড় দিয়ে ঢেকে, রোদে শুকানোর জন্য রেখে দেওয়া হয়। তিনি আমসত্ত প্রস্তুত …

— কল্যাণী দত্ত

साँचों का किस्सा
Volume 1 | Issue 11 [March 2022]

आमों का मौसम पूरे शबाब पर था। यह दृश्य उन्हीं दिनों का है। मेरे पति की माँ- बेला, आँगन में बैठी थी और अपने सामने रखे आमों से भरे टोकरे में से एक –एक आम को बड़ी निपुणता से अपने हाथों के बीच दबा दबाकर आमों का रस निकालती जा रही थी। और फिर उस रस को वह तेल चुपड़े मिट्टी के साँचों में ढारती जा रही थी। रस की एक परत के ऊपर वह दूसरी परत जमाती जा रही थी। जब परत …

— कल्याणी दत्ता

Unbreaking the Mould
Volume 1 | Issue 11 [March 2022]

The mango season was in full swing. Bela, my husband’s mother, sat in the courtyard with a basketful of mangoes and squeezed the juice out of the fruits one by one, and spread it over oiled clay moulds. Layer after layer the juice was applied, till the coating on the moulds was sufficiently thick…

— Kalyani Dutta

लंगर –‘किसान नहीं तो खाना नहीं’ आंदोलन की धड़कन
Volume 1 | Issue 10 [February 2022]

वह 28 अगस्त का दिन था, जब करनाल के पास बस्तारा टोल प्लाज़ा पर किसान इकट्ठा हो हरियाणा के मुख्यमंत्री एम. एल. खट्टर का विरोध कर रहे थे और पुलिस ने उनपर 5 बार लाठी चार्ज किया था।लाठी के ये प्रहार जानलेवा थे। बहुत सारे किसान घायल हुए। उनमें से एक थे 45 वर्षीय सुशील काजल जो पीठ पर अनेक चोटों के साथ घर पहुंचे। मार के कारण उनका पेट भी बुरी तरह सूज गया था…

—अमनदीप संधु

Langar – the heart of the ‘No Farmer, No Food’ Protests
Volume 1 | Issue 10 [February 2022]

On August 28th, while farmers were protesting against Haryana chief minister ML Khattar at Bastara Toll Plaza near Karnal, the police carried out five rounds of lathi charge. The beating was brutal, many farmers sustained injuries. One of them, 45-year-old Sushil Kajal…

—Amandeep Sandhu

ਲੰਗਰ – ‘ਨੋ ਫਾਰਮਰ ਨੋ ਫੂਡ’ ਦੇ ਨਾਅਰਿਆਂ ਵਾਲੇ ਅੰਦੋਲਨ ਦਾ ਧੁਰਾ
Volume 1 | Issue 10 [February 2022]

੨੮ ਅਗਸਤ,੨੦੨੧ ਨੂੰ ਜਦੋਂ ਕਿਸਾਨ ਕਰਨਾਲ ਨੇੜਲੇ ਬਸਤਾਰਾ ਟੋਲ ਪਲਾਜ਼ੇ ‘ਤੇ ਹਰਿਆਣੇ ਦੇ ਮੁੱਖ-ਮੰਤਰੀ ਮੋਹਨ ਲਾਲ ਖੱਟਰ ਵਿਰੁੱਧ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ ਤਾਂ ਪੁਲਿਸ ਨੇ ਪੰਜ ਝੁੱਟੀਆਂ ‘ਚ ਲਾਠੀਚਾਰਜ ਕੀਤਾ। ਕਿਸਾਨਾਂ ਨੂੰ ਏਨੀ ਬੁਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਕੁੱਟਿਆ ਗਿਆ ਕਿ ਉਹਨਾਂ ‘ਚੋਂ ਬਹੁਤੇ ਜ਼ਖ਼ਮੀ ਹੋ ਗਏ। ਉਹਨਾਂ ‘ਚੋਂ ਇਕ ਸ਼ੁਸ਼ੀਲ ਕਾਜਲ ਆਪਣੀ ਢੂਈ ‘ਤੇ ਲਾਸਾਂ ਅਤੇ ਸੁੱਜਿਆ ਢਿੱਡ ਲੈ ਕੇ ਘਰੇ ਮੁੜਿਆ। ਅਗਲੀ ਸਵੇਰ ਉਹ ਪੂਰਾ…

—ਅਮਨਦੀਪ ਸੰਧੂ

کارسازوں کے ساتھ کھان پان
Volume 1 | Issue 9 [January 2022]

طویل عرصے سے بھلا دئے گئے واقعات سے کھانے کو جوڑنے والا ادب کا سبسے مشہور کام یقیناً مارسیل پراؤسٹ کی فرانسیسی کلاسک کا درجہ رکھنے والی سات جلدوں میں تحریر کردہ کتاب “ریممبرینس آف تھنگس پاسٹ” ہی ہوگی جسے انیسویں صدی کے آخر اور بیسویں صدی کی ابتدا میں لکھا گیا۔ ایک موقع پر، چارلس سوان، مرکزی کردار، لیموں کے پھولوں کی چائے میں ڈوبی ہوئی میڈلین نامی ایک نازک لمبے چوڑے چائے کیک کے ایک ٹکڑے کو منہ میں رکھتا ہے، جس کے ذائقے اچانک اس کے بچپن کی یادوں کا ایک خزانہ کھول دیتے ہیں۔ اس کے بعد ایک

—-جیا جیٹلی

Eating with the makers
Volume 1 | Issue 9 [January 2022]

The most popular work of literature connecting food to incidents long forgotten would surely be Marcel Proust’s Remembrance of Things Past, a French classic written in seven volumes between the late 19th and early 20th century. On one occasion, Charles Swann, the protagonist, takes a bite off a delicate oblong tea cake called a madeleine dipped in lemon flower tea…

—Jaya Jaitly

रचने वालों के साथ खाना
Volume 1 | Issue 9 [January 2022]

भूली बिसरी घटनाओं को खाने से जुड़ी यादों के साथ दर्शाने वाला सबसे लोकप्रिय साहित्य, शायद उसी किताब में दर्ज है जिसे मार्सल प्रूस्त ने रेमेंबरन्स ऑफ थिंग्स पास्ट  में शिद्दत से अंकित किया है। 19 वीं और 20वीं सदी के शुरुआती दौर में प्रूस्त ने सात खंडों में इस क्लासिक की रचना की। किताब में चार्ल्स स्वान नाम का नायक, एक बार आयताकार टी केक के एक टुकड़े को खाता है, जिसके बारे में विवरण है कि वह मेडेलीन  से बना है जिसे कुछ समय के लिये नींबू के फूलों से बनी चाय में डुबो कर रखा गया था…

—जया जेटली

Bhanukul’s Kitchen Raga-Marathi
Volume 1 | Issue 8 [December 2021]

हिंदीत एक प्रसिद्ध म्हण आहे ‘ सुबह काशी, शामे अवध और शबे मालवा’ म्हणजे सकाळ असावी तर काशीसारखी, संध्याकाळ अवधेसारखी तर रात्र माळवासारखी. माळवा, म्हणजे मध्य भारतातल्या विंध्य पर्वतरांगांमधलं पठार. इतर भागांच्या तुलनेत माळवातलं हवामान सुखद गारवा देणारं आणि रमणीय आहे. इथली जमीन तर सुपीक आहेच, शिवाय बघावं तिथे पाणीच पाणी आहे! अशा ‘माळवा’तला माझा जन्म आहे.

— कलापिनी कोमकली

Bhanukul’s Kitchen Raga-Hindi
Volume 1 | Issue 8 [December 2021]

एक जानी-मानी कहावत है- सुबह काशी, शामे अवध और शबे मालवा. यह वह भू-भाग है जहाँ की आबो-हवा प्रदेश के दूसरे भागों की तुलना में शीतल, संतुलित और रम्य है. तो मेरा जन्म ऐसे ‘मालवा’ में हुआ जहाँ की काली माटी भरपूर उपजाऊ है साथ में डग-डग पर पानी भी. मैं जिस परिवेश में जन्मी और पली बढ़ी वहाँ चहूँओर स्वर गुंजायमान थे. जिस तरह संगीत के घरानों की खूबियों को सराहा जाता रहा, उसी तरह अलग-अलग संस्कृति के खानपान का भी ऐसा अनूठा संगम रहा, कि क्या कहा जाए…

— कलापिनी कोमकली

Bhanukul’s Kitchen Raga
Volume 1 | Issue 8 [December 2021]

Once, no raw mangoes had sprouted on our mango tree yet, and we suddenly found a green mango on the ground. Baba cut open that lone mango with a sharp knife, cut long slices out of it, topped it with salt and red chilli powder, and served it to everyone at the table! That too with sounds of aahaa…waah. His habit of appreciating even the littlest of things was truly extraordinary….

— Kalapini Komkali

Yamini Krishnan
Volume 1 | Issue 7 [November 2021]

I dream of the smell of starch at midnight—
when we are the best kind of drunk, someone
I love saying I love cocktails it’s like drinking juice
and then you’re happy all of a sudden—

Zainab Ummer Farook
Volume 1 | Issue 7 [November 2021]

Inching through ridge and rind,
your knife breaches this fortress
of hardiness, green hide giving way
to pods of gold. What beguiles you

Yamini Krishnan
Volume 1 | Issue 7 [November 2021]

After changing into baggy, already-stained
t-shirts, we set up the feast. Plastic containers
everywhere, we always order too much
garlic naan, and today I want to apologise

মেঘবালিকার সন্ধানে
Volume 1 | Issue 6 [October 2021]

আমি তাকে বিয়ে করি কবিতার জন্য আর সে আমাকে বিয়ে করে আমার রান্নার দক্ষতার জন্য। অনেকবারই কলকাতায় লোকাল ট্রেনে যাতায়াত করার সময় সে আমাকে বলতো যে তার মতে আমার লাঞ্চ বক্সে রাখা খাবারটাই নাকি আমার সম্পর্কে দ্বিতীয় সবচেয়ে আকর্ষণীয় বিষয়। আর সবচেয়ে বেশি আকর্ষণীয় বিষয় হচ্ছে খাবারটি আমি নিজেই রান্না করেছি…
— অভিষেক মজুমদার

मेघबालिका की तलाश में
Volume 1 | Issue 6 [October 2021]

मैंने कविता के प्रेम की वजह से उससे शादी की थी और वह कहती थी कि उसने मेरे खाने को लेकर मुझसे शादी की है। उन तमाम लोकल ट्रेन से की गई यात्राओं के दौरान, जो हमने कॉलेज के दिनों में साथ-साथ तय की थीं वह यही बात बार बार कहा करती थी-मेरे खाने का डब्बा, मेरी दूसरी सबसे आकर्षित करने वाली बात थी उसके लिए; और पहली आकर्षित करने वाली बात तो निस्संदेह मेरा उस खाने को अपने हाथों से बनाना था!
— अभिषेक मजूमदार

In Search of Meghbalika
Volume 1 | Issue 6 [October 2021]

I had married her for poetry, and she said that she had married me for food. She had said to me on several local train rides while we were still in college in Calcutta, that the food in my lunch box was the second most attractive thing about me. The most attractive thing was that I had cooked it myself…
— Abhishek Majumdar

पदेर पदेर पाव
Volume 1 | Issue 5 [September 2021]

तांबडो, हळडुवो, निळो, पिंगसो, काळसो अशा रंगांच्यो विंगड विंगड सया मिरोवपी अस्तमतेचें मळब तोखेतना आमोरी केन्ना सरली कळ्ळेंच ना. बुडपी सुर्याक पळोवपी आमचे दोळे सुर्याक पळोवन…
— दामोदर मावजो

पदेराची बेकरी, बेकरीचे पाव
Volume 1 | Issue 5 [September 2021]

लाल, पिवळा, नीळा, पिंगट, काळा अशा विविध रंगांच्या छ्टा मिरवणाऱ्या मावळतीकडे विस्फारलेल्या नेत्रांनी पहाताना संध्याकाळ केव्हा सरली कळलंच नाही. सुर्यास्त पहायला आसुसलेल्या आमच्या…
— दामोदर मावजो

Baker, baker, Bake Me Bread
Volume 1 | Issue 5 [September 2021]

As the setting sun rushed to kiss the western horizon goodbye, shades of red, orange and yellow danced with tinges of gold, black and blue…
— Damodar Mauzo

पुडिंग, सलाद और सारू जैसी ज़रूरी बातें
Volume 1 | Issue 4 [August 2021]

एक बार एक विद्यार्थी गुरूकुल में पढ़ने जाता है। गुरु अपनी पत्नी को निर्देश देते हैं कि उसे सिर्फ चावल और अरंडी का तेल दिया जाये। विद्यार्थी इसे गुरु का आदेश मान भक्त-भाव से ग्रहण करता है…

— पुष्पमाला एन.

ಪುಡ್ಡಿಂಗ್, ಸಲಾಡ್, ಸಾರು ಮತ್ತಿತರ ಅರ್ಜೆಂಟ್ ಸಮಾಚಾರಗಳು
Volume 1 | Issue 4 [August 2021]

ತಮ್ಮ ಇತ್ತೀಚಿನ ‘ಗೌರಿ ಲಂಕೇಶರ ಅರ್ಜೆಂಟ್ ಸಾರು’ ಪ್ರದರ್ಶನದ ನಂತರ ಪುಷ್ಪಮಾಲಾರವರೊಡನೆ ಎನ್. ರಾಜ್ಯಲಕ್ಷ್ಮಿರವರು ನಡೆಸಿದ ಸಂದರ್ಶನ…

— ಪುಷ್ಪಮಾಲಾ ಎನ್

Pudding, salad, saaru and such Urgent Matters
Volume 1 | Issue 4 [August 2021]

The celebrated art theorist N. Rajyalakshmi interviews artist Pushpamala N. after her recent performance of Gauri Lankesh’s Urgent Saaru, in Bengaluru…

— Pushpamala N.

প্ৰাচীন পুথি, ৰাইফল ইত্যাদি : ৰৌ আৰু জিলাপীৰ পম খেদি
Volume 1 | Issue 3 [July 2021]

হিন্দুসকলৰ খাদ্যাভ্যাসক কেন্দ্ৰ কৰি এ. কে. ৰামানুজনে তেওঁৰ এখন ৰচনাত এটি কাহিনী বৰ্ণনা কৰিছিল। গুৰুকূলৰ শিষ্য এজনক আহাৰৰ নামত গুৰুৱে হেনো মাথো এৰা গুটিৰ তেলেৰে ভাত এমুঠি গুৰুপত্নীক দিবলৈ নিৰ্দ্দেশ দিয়ে…

— আশুতোষ ভৰদ্বাজ

पांडुलिपियों और बंदूकों की डगर पर रोहू मछली और जलेबी
Volume 1 | Issue 3 [July 2021]

एक बार एक विद्यार्थी गुरूकुल में पढ़ने जाता है। गुरु अपनी पत्नी को निर्देश देते हैं कि उसे सिर्फ चावल और अरंडी का तेल दिया जाये। विद्यार्थी इसे गुरु का आदेश मान भक्त-भाव से ग्रहण करता है…

— आशुतोष भारद्वाज

Ancient Manuscripts and Assault Rifles: On the Trail of Rohu and Jalebi
Volume 1 | Issue 3 [July 2021]

In an essay on Hindu food practices, A K Ramanujan narrates a tale about a student in a gurukul whose master instructs his wife to serve the young boy only rice with castor oil…

— Ashutosh Bhardwaj

I remember the life, not the recipes
Volume 1 | Issue 2 [June 2021]

Now that I am three score and ten, I consider food with a degree of respect. I am conscious of the manner, quantity, quality and time of its consumption; also how long what I consume will stay undigested, and of the consequent level of comfort or discomfort thereafter…

— Leela Samson

मुझे खाने के किस्से याद हैं , व्यंजन बनाने की विधियाँ नहीं
Volume 1 | Issue 2 [June 2021]

अब जब मैं 70 बरस की हो गई हूँ, तब जाकर मैं खाने का आदर करने लगी हूँ। अब मैं समझ चुकी हूँ कि खाना सिर्फ खाकर निपटाने की चीज़ नहीं है बल्कि उसे खाने के विविध तरीके होते हैं और उसकी मात्रा तथा गुणवत्ता का सही होना, निहायत ज़रूरी है…

— Leela Samson

मला जगणं आठवतं, पाककृती नाही.
Volume 1 | Issue 2 [June 2021]

आता जेव्हा मी वयाची सत्तरी गाठली आहे, तेव्हा माझ्या मनात अन्नाबद्दलचा आदर अतिशय वाढला आहे. अन्न कधी खायचं, कसं खायचं, किती खायचं आणि काय खायचं याचं भान मला आहे. इतकंच नाही तर एखादं अन्न खाल्ल्यावर ते किती काळ अजीर्ण राहू शकतं आणि माझ्या पोटावर त्याचा बरा वाईट परिणाम…

— Leela Samson

The Tales of Sri Sri Bhajahari Radhuni
Volume 1 | Issue 1 [May 2021]

I don’t call myself a ‘lekhak’, or a writer. Just as people become players—or a ‘khelowar’—by playing and playing, I, too, have become a ‘lekhowar’, almost inadvertently, without any formal training, in my years of writing. But before I was a ‘lekhowar’…

— Manoranjan Byapari

আমি শ্রীশ্রী ভজহরি রাঁধুনি
Volume 1 | Issue 1 [May 2021]

লেখক নয়, আমি নিজেকে বলে থাকি লেখোয়াড়। সেই যেমন লোকে খেলতে খেলতে খেলোয়াড় হয়ে যায়- কোন তালিম ছাড়াই লিখতে লিখতে আমি হয়ে গেছি লেখোয়াড়। তবে লেখোয়াড় হবার আগে ছিলাম রাঁধুনি । তাঁর আগে রিকশা চালক । তাঁর আগে যে আরো কত কী !

— Manoranjan Byapari

श्री भजहरी राधुनि की कथाएँ
Volume 1 | Issue 1 [May 2021]

मैं अपने-आप को लेखक नहीं समझता। जैसे खेलते – खेलते लोग खिलाड़ी कहलाने लगते हैं उसी तरह मैं बिन मंशा, बिन पढ़ाई –लिखाई, लिखने लगा और लेखक कहलाया जाने लगा। लेकिन लेखक होने से पहले मैं एक रसोइया था। उससे पहले मैं रिक्शा चलाया करता था और उससे भी पहले… क्या-क्या कहूँ? फेहरिस्त लंबी है।

— Manoranjan Byapari

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