बांग्ला से अनुवाद – अमृता बेरा
चित्र – समीम अख्तर शेख
बंगालियों के खान-पान की संस्कृति के बारे में सोचने पर महसूस हुआ कि बंगालियों को ‘भेतो बंगाली’- (भात खाने वाला बंगाली) जैसी अकर्मण्य संज्ञा देना, निहायत ही बेवकूफ़ाना सोच है। बंगाली ज़ायक़े की दुनिया को कितना कुछ दे पाया है, यह तो मैं नहीं जानता; लेकिन उसने युगों-युगों से दुनिया के अलग-अलग प्रांतों से बहुत कुछ अपनाया ज़रूर है — चाहे वह बंगाली हिंदू हो या मुसलमान। बंगाली अब सिर्फ़ ‘भेतो’ बनकर नहीं बैठा है। अब वह मोमो बंगाली, पिज़्ज़ू-बंगाली,बिरानिया-बंगाली जैसी कई नई उपाधियों से नवाज़ा जा सकता है।
अगर मैं बंगाली मुसलमानों की बात कहूँ तो एक देहाती मुहावरा याद आता है; कहा जाता है कि – “हिंदूदेर बाड़ी आर मुसलमानेर हाँड़ी – दुटी तेई थाके चाकचिक्यो – हिंदुओं का घर और मुसलमानों की हांडी — दोनों ही होती हैं चमकदार, सजी-धजी”।
बंगाल के भूमिपुत्र, बांग्ला भाषी मुसलमानों को ‘बंगाली’ माना जाए या नहीं; इस पर एक अड़ियल बहस छिड़ी हुई है। नतीजा यह कि मुसलमानों के खान-पान की तहज़ीब को क्या बंगालियों की खाद्य-संस्कृति का हिस्सा मानने का दुस्साहस किया भी जा सकता है या नहीं; बुद्धिजीवी वर्ग के बीच यह भी भारी ऊहापोह का विषय है!
मुसलमानों की हांडी की ख़ासियत और उसकी रईसी यह है कि उसका आकार बड़ा होना चाहिए, और धातु के नाम पर वह तांबे की होनी चाहिए। कहते हैं पकाते वक़्त जब तक बर्तनों से धड़ांग-धड़ांग की आवाज़ न गूँजे, तब तक पकाने का मज़ा ही नहीं आता है। ख़ैर, यह बात तो सिर्फ़ जलसे-दावतों या त्योहारों के मौक़े पर ही लागू होती है। मैं यहाँ किसी बड़े जश्न की नहीं, बल्कि महीने भर चलने वाले रमज़ान के एक दिन की इफ़्तारी के बारे में कुछ बताना चाहता हूँ।

उस रोज़ मेरे अज़ीज़, डॉ. बी. चौधरी इफ़्तार की दावत पर घर आए। मग़रिब के मेहमान के साथ मैं इफ़्तारी के दस्तरख़्वान पर बैठा था। सामने तरह-तरह के पकवान सजे थे। उनकी कौतूहल से भरी नज़रों को देख मैंने कहा, “क्या सोच रहे हैं जनाब?” उन्होंने कहा, “इफ़्तारी के इतने सारे पकवान एक साथ पेट के हवाले करने के भयानक अंजाम के बारे में सोच रहा हूँ। सुबह से बिना पानी के रोज़े के बाद क्या यह सब शरीर सह लेगा?” मैं हँसा। वे डॉक्टर ठहरे, ये सब बातें उनके ज़हन में आना स्वाभाविक था।
सच में, हाथ के सामने दस्तरख़्वान पर प्लेट में खजूर रखे थे। यह एक फल बंगाली मुसलमान के लिए सिर्फ़ पैग़ंबर मुहम्मद से उनके दिली लगाव की वजह से मुक़द्दस है। बात यह है कि रेगिस्तान के पुराने ज़माने से चले आ रहे इस क़ौमी सरमाये खजूर फल को वे खाते थे और बेहद पसंद करते थे। वैसे बंगाल के ग्रामीण इलाक़ों में मिलने वाले बेर या केले से इफ़्तारी करने से निश्चित ही उनका ईमान नहीं डिगता, लेकिन खजूर मुसलमान समाज की एक ख़ास रिवायत बन चुका है। सुन्नत का हिस्सा है। खजूर के साथ ही इफ़्तार का बिस्मिल्लाह किया जाता है।
खजूर मुँह में रहते-रहते ही जो ठंडा तरल हाथ में लिया जाता है, उसे शरबत कहते हैं। शरबत मूल रूप से फ़ारसी का लफ़्ज़ है। लेकिन इसकी उत्पत्ति अरबी शब्द ‘शराब’ से हुई है, जिसका मतलब है पीना। फ़ारसी से यह तुर्की शब्द ‘सारबेत’ बनकर शायद बंगाल में ‘शरबत’ के नाम से चलन में आया है। यह तरल सिर्फ़ इफ़्तार के वक़्त ही नहीं, बल्कि घर में मेहमान आने पर उनकी ख़ातिरदारी का पहला क़दम ‘शरबत’ ही होता है। कांच के गिलास में पहले रंगीन शरबत पेश किया जाता है, उसके बाद चाय-नाश्ता। बंगाली मुसलमान अपने बच्चों का नाम अरबी-फ़ारसी भाषा में रखना काफ़ी पसंद करते हैं। इसे लेकर एक क़िस्सा है। एक लड़की का नाम ‘शरबत’ रखा गया, उसकी पदवी ‘ख़ान’ थी। तो, कुल मिलाकर उसका नाम ‘शरबत ख़ान’ था। उस लड़की को लड़के वाले देखने आए। लड़की ने शरबत का गिलास बढ़ाते ही ख़ानदान के मुरब्बी ने पूछा, “बेटी, तुम्हारा नाम क्या है?” उसने जवाब दिया, “शरबत खान” (यहां ख़ान को बिना नुक्ते के ‘ख’ के साथ पढ़ना होगा)। मुरब्बी ने कहा, “वो तो पियूँगा ही, अपना नाम तो बताओ?” तब भी लड़की ने कहा, “शरबत खान”। अच्छी मुसीबत है! बुज़ुर्ग ने गटागट शर्बत पी लिया और फिर से पूछा, “अच्छा अब बताओ तुम्हारा नाम क्या है?” लड़की ने फिर वही कहा, “शरबत खान”। इधर शरबत का गिलास तो ख़ाली था! तब वह क्या खाते (पीते)? बंगाली सब कुछ ही खाते हैं, पीते नहीं।
तो, बंगाली मुसलमानों ने शरबत के लिए ऐसी चाहत कहां से पाई? इस्लामी धर्मग्रंथ में ज़िक़्र है कि जब कोई ईमानदार इंसान जन्नत में दाख़िल होगा तो उसे ‘शराबन तहरूरा’ शरबत पीने को दिया जाएगा, जो शहद से ज़्यादा मीठी और दूध से ज़्यादा सफ़ेद होगी। इस शरबत को पीने के बाद परलोक में प्यास नाम का एहसास ही ख़त्म हो जाएगा।
मुसलमानों की हुकूमत में शरबत की लोकप्रियता बहुत बढ़ी। मीठे अतर के मेल से बने रूहअफ़्ज़ा शरबत में जन्नत की ख़ुशबू होती है। ख़ैर, शरबत का दौर ख़त्म होने के बाद डॉक्टर साहब ने देखा कि वहां मौजूद कई लोग तरह-तरह के फल खा रहे हैं। कोई-कोई छोटी चमची से मिट्टी से बनी छोटी कटोरियों में कुछ खा रहे हैं। इसका नाम फिरनी था। ‘फिरनी’ शब्द भी मूल फ़ारसी का शब्द है। चावल के चूरे, दूध, शक्कर और ख़ुशबूदार मसालों से तैयार की ‘फिरनी’, बेहद ज़ायक़ेदार और गाढ़ी खीर जैसी रिवायाती मिठाई है। इसे बनाने के लिए भिगोए हुए बासमती या गोविंदभोग चावलों के पेस्ट को दूध के साथ मिलाकर घना होने तक पकाया जाता है।

देशी-विदेशी हर क़िस्म के फलाहार के बाद लाया जाता है बंगालियों की सबसे क़रीबी चीज़, कुरकुरी-मचमच करती मूड़ी, यानी मुरमुरे। लेकिन मूड़ी कभी अकेली नहीं लाई जाती। उसके साथ तेले-भाजा, यानी तेल में तले पकौड़े, होना लाज़मी होता है। इफ़्तार के साथ तेले-भाजा का रिश्ता कितना पुराना है, मुझे मालूम नहीं। लेकिन, अलग-अलग मुल्कों में रोज़ेदारों के लिए इफ़्तार में तेल-पकौड़ियां ख़ास अहमियत रखती हैं और बेहद पसंदीदा हैं। चाहे वह पश्चिमी देश हो, तेल से तर-ब-तर मिडल ईस्ट हो या फिर यह उपमहाद्वीप। इफ़्तार में तेल-पकौड़े तो चाहिए ही चाहिए।
बंगाल में लगभग हर गली-मोड़ पर तेले-भाजा की दुकानें हैं। राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री ने शायद बहुत ध्यान से तेले-भाजा के इस धंधे पर इतना ज़ोर दिया था। लेकिन अफ़सोस कि वो इसकी असल अहमियत समझा नहीं पाईं? और फिर वही क्यों? स्वयं प्रधानमंत्री ने भी देश की युवाशक्ति को पकौड़ों की दुकान खोलने का मश्विरा दिया है। वह जनता के सफ़ेद धन पर पूरी दुनिया की सैर कर रहे हैं, और वो जो काला धन वापस लाने की बात थी? वो तो वह बेमालूम भूलकर अब यह समझे हैं कि तेल के बिना गति नहीं। देश में तेल चाहिए। आप चाय बेचते-बेचते बहुत ऊंचे ओहदे पर पहुंचेंगे? उसके लिए तेल चाहिए! आप फ़क़ीर-सन्यासी टाइप होकर भी मुख्यमंत्री बनेंगे? आपको तेल लगाना होगा। वैसे, जहां-तहां मलत्याग और दलत्याग आम बात हो गई है।
दीदी का शासन तो अब ख़त्म हो गया। हो सकता है, मुस्लिम तुष्टीकरण की कुछ बदनामी इस तेले-भाजा की वजह से भी उन पर आई हो। क्योंकि, एक तरफ़ तो उन्होंने तेले-भाजा को बेरोज़गारी दूर करने का एक बेहतरीन ज़रिया बताया था, और दूसरी तरफ़ इसके जो धुआंधार ख़रीददार हैं, वो अल्पसंख्यक (मुस्लिम) समाज के लोग हैं। आख़िर, रमज़ान के महीने में तेले-भाजा की मांग भी तो आसमान छू जाती है।
ख़ैर, हम वापस लौट आते हैं इफ़्तारी की महफ़िल में। यहां तमाम लज़ीज़ पकवानों के साथ-साथ तेले-भाजा भी अपनी ख़ूबियों की चमक में सजे हुए हैं। किसी एक तेले-भाजा का नाम है ‘बम!’ डॉक्टर साहब के दोस्त शंकर-दा शायद यह नाम सुनकर भौंचक्के रह गए, लेकिन यह बम पंचायत के चुनाव में चलने वाला बम नहीं है। इसका वजूद चॉप-आलूड़ी-पिंयाजी-बेगुनी, यानी आलू-प्याज़-बैंगन के पकौड़ों को टक्कर देते हुए उभरा है। आकार में यह बुड़ीमाँ ब्रांड पटाख़ों के चॉकलेट बम से थोड़ा सा बड़ा है। भीतर बारूद की जगह गो-मांस का क़ीमा ठसाठस भरा हुआ है, जिसे ‘गोरूद’ कहा जा सकता है! जो बारूद से भी ज़्यादा ख़तरनाक (?) है। बारूद तो केवल शरीर पर असर डालता है, गोरूद का असर तो पूरी देश की राजनीति पर है।

इस बम का स्वाद बेमिसाल है। मेरे पास बैठे मेरे दोस्त मारूफ़ ने हँसते हुए पूछा, “यह जो मासूम सा बम देख रहे हैं; यह देश के लिए कितना ख़तरनाक लगता है आपको? मैंने कहा, “क्या कह रहे हो दोस्त, देश की पूरी सोच और चिंता इसी गोश्त के ही तो ईर्द-गिर्द घूम रही है। बीफ़-बम फट रहा है, तभी तो समाज और देश की तस्वीर बदल रही है, भाई। यह जो इतने सारे दाढ़ी-टोपी वाले मुसलमान एकसाथ इफ़्तार कर रहे हैं, सभी बम के साथ बड़े चाव से खाने में मसरूफ़ हैं, देख रहे हो न? अभी यहाँ कोई मुस्लिम-विरोधी पत्रकार हाज़िर हो जाए; तो वह वापस लौटकर अपने अख़बार में क्या लिखेगा? डॉक्टर साहब ने हँसकर दरियाफ़्त किया, “क्या लिखेगा?”
मैंने कहा, उसे लिखना ही पड़ेगा कि “मुसलमान सिर्फ़ बम बनाते ही नहीं, बल्कि बम खाकर हज़म भी कर जाते हैं। कोई सौ एक लोगों का थाली में बम खाने का नज़ारा वो अपनी आँखों से देखकर गया है। बम खाने वाले मुसलमान उसके ज़ायक़े के ज़िक़्र में मशग़ूल थे। कोई कह रहा था, अगर मिर्च थोड़ी और तेज़ होती तो अच्छा होता। तो कोई नमक कम होने की बात कह रहा था। आख़िर में शायद निचोड़ में वह लिखेगा – प्यारे पाठकों, आप ख़ुद सोचिए, क्या यह तीखापन सिर्फ़ मिर्च का तीखापन है? या कोई सांकेतिक परमाणु-तीखापन है, इसका अंदाज़ा आप ख़ुद लगाइए। याद दिला दूँ – सभी के पोशाक मदरसा के पोशाक थे। सफ़ेद कुर्ता और सिर पर टोपी! यह भी सिरदर्द की वजह नहीं है क्या? बम हज़म करने वाले ये आतंकवादी लोग देश के लिए कितने ज़्यादा ख़तरनाक हो सकते हैं! यह तो सीधे गृह-मंत्रालय को देखना चाहिए।
कई लोग इस बात पर हंस पड़े। मारूफ़ ने आगे कहा, “इसे पढ़कर एक ख़ास तबके के प्रगतिशील देश भक्तों की रातों की नींद उड़ सकती है। कुछ नेता संसद में इस मसले को उठा भी सकते हैं! कुछ बुद्धिजीवी राजपथ पर मोमबत्तियाँ लेकर दौड़-भाग भी शुरू कर सकते हैं। उनकी मांग होगी कि देश के सारे मदरसों को बंद कर देना चाहिए”।
इफ़्तार के सबसे ख़ास पकवान का नाम है हलीम। बंगाली मुस्लिम समाज का यह एक लोकप्रिय आइटम है। कुछ लोग तो इसे ‘डालिम’ यानी अनार भी कहना चाहते हैं। कम से कम दस-बारह क़िस्म की दालें, गेहूं और चावल के आटे को लगभग सात घंटे तक भिगोकर रखा जाता है। साथ में गोश्त के टुकड़े। तरह-तरह के मसालों के साथ इसे पकाने में दस घंटे का समय लगता है। इसे लगातार घोट-घोटकर पकाकर बिल्कुल गाढ़ा और लसदार बना दिया जाता है। उसके बाद बारीक़ कतरी प्याज़ को भूनकर ऊपर से छिड़क दिया जाता है। इस बेमिसाल, सेहत से भरपूर व्यंजन को देखकर डॉक्टर साहब ने अपना सिर हिलाया। बिना पानी के रोज़े की सारी कमी यहीं पूरी हो जाती है।

कमियों की कितनी भरपाई होती है, वो तो ख़ैर साफ़ पता नहीं चलता है। क्योंकि एक माह के रोज़ों के बाद आती है चाँदरात। और अगले दिन ईद। ईद के लिए चाँदरात को कुछ ख़ास पकवान बनाए जाते हैं। बंगाली मुसलमानों के घर के एक बहुत ही रिवायती खाने का नाम है ‘चावल के आटे की सफ़ेद रोटी’। यह रोटी इतनी पतली, मुलायम और बेदाग़ होती है कि हाथ में लेने पर लगता है जैसे पुराने ज़माने का कोई महीन ढाकाई मलमल का कपड़ा हो। चावल के चूरे को भिगोकर, फिर उसे सुखाकर बिल्कुल महीन आटा तैयार किया जाता है। उस आटे को बड़े पतीले में उबलते पानी में डालकर पहले ख़मीर (लेई) बनाया जाता है। यह काम बड़े एहतियात से करना पड़ता है। ख़मीर अच्छा नहीं बना तो रोटी भी अच्छी नहीं बनती है। फिर उस ख़मीर के पेड़े काटकर हाथ से बेलना होता है। उसके बाद धीमी आंच में उसे सेका जाता है। इन रोटियों को सेवई(सिमई) के साथ खाया जाता है। फिर तो यहाँ सिमई का प्रसंग लाना ही होगा। अकेली सिमई ही मुस्लिम दुनिया में बाहर से आई मेहमान है। भाषाशास्त्री सुनीतिकुमार चट्टोपाध्याय के मुताबिक़ – सिमई शब्द की उत्पत्ति ग्रीक शब्द ‘सेमिदालिस’ से हुई है। सेमिदालिस शब्द का मतलब है मैदा। अलेक्ज़ेंडर के भारत के आक्रमण के वक़्त से ग्रीक-भारतीय संबंधों के ज़रिए यह शब्द बांग्ला में दाख़िल हुआ। मज़े की बात यह है कि उस वक़्त बंगाल नाम का कोई भूभाग था ही नहीं। अब चाहे सेवई(सिमई) ग्रीक ज़बान से आई हो या तुर्की से, बात वो नहीं है; बड़ी बात यह है कि सिमई आकर बंगाली मुसलमानों की हांडी में समा गई। वो भी ईद की ख़ुशी के दिन उसका आना हुआ। नतीजा यह है कि सिमई का मुस्लिमीकरण बहुत पहले ही हो चुका है। और चूंकि उसकी ज़ात चली गई, इसलिए हिन्दूओं के घर में उसे शरण नहीं मिली।
कुछ दशकों पहले तक नानी-दादियाँ अपने हाथों से सिमई के लच्छे बनाती थीं। बाद में मशीन आ गई, जिसे हाथ से घुमाकर सिमई बनने लगी। अब यह बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ बनाने लगीं हैं, तो अब यह बाज़ार का उत्पादन हो गई है। असल में सिमई दो तरह की होती हैं – सूरो सिमई और झूरो सिमई। सूरो सिमई का मतलब है जो दूध के अंदर एक-दूसरे से लिपटी डुबकियाँ लगाती हैं, और झूरो सिमई सूखी ज़मीन पर रहती है, बिल्कुल सूखी-सूखी। यह सिमई बंगाली मुस्लिम घरों की बहुत ही निजी मेहमान है। चावल के आटे की रोटी के साथ ही उसकी जोड़ी जमती है। .

हिंदुस्तान के पश्चिम बंगाल के बंगाली मुसलमानों के खान-पान की तहज़ीब का एक छोटा सा नमूना यहां पेश किया गया है। अलग-अलग इलाक़ों में और भी तमाम व्यंजनों की विविधता देखी जा सकती है। अगर खाने-पीने की चीज़ों पर क़ानूनी पाबंदियां न लगाई जातीं, तो खान-पान की यह विविधता और भी फलती-फूलती और फैलती।
