अनुवाद : गीत चतुर्वेदी
मैं एक जून 1979 को ट्रेन से दिल्ली से कटक पहुँची। मुझे याद है, स्टेशन से मैंने साइकिल रिक्शा लिया और सीधे अपने गुरुजी केलुचरण महापात्र के घर गई। कामकाजी स्त्रियों का एक हॉस्टल मेरे रहने का पहला ठौर बना। गर्मी की छुट्टियों के कारण वह ख़ाली था। मॉनसून की शुरुआत थी, गर्मी और उमस थी, और मेरा ख़्याल है कि पूरे एक महीने तक केवल छाछ और पेजा, जोकि चावल उबालने का पानी होता है, पीकर ही मैं जीवित रही। उन बरसों में भारत में फिल्टर्ड या ‘बिस्लरी’ का बोतलबंद पानी नहीं मिलता था और मुझ जैसे इंसान, जिसकी आँतों को इस तरह के तरल खाद्य-पदार्थों को पचाने की कोई ट्रेनिंग नहीं मिली थी, के लिए यह काफ़ी जोखिम-भरा रहा होगा।
लेकिन मैं जीवित बच गई।

कुछ महीनों बाद, मुझे एक बंगाली परिवार में बतौर पेइंग गेस्ट रहने की जगह मिली। कटक के अपने नौ बरस मैंने पूरी तरह वहीं रहकर गुज़ारे, जब तक कि मैं भुवनेश्वर नहीं चली गई। मेरे दिन और रात के खाने का इंतज़ाम मकान-मालकिन करती थीं, जोकि बुज़ुर्ग और भद्र महिला थीं और बंगाली शैली का खाना बनाती थीं। (मैंने कभी रसोईघर में झॉंक कर भी नहीं देखा कि खाना कैसे बनता है। सो, मैंने कुछ नहीं सीखा; बस, जो कुछ परोसा जाता था, उसे खाकर मैं ख़ुश हो जाती थी।)
उन दिनों मैं शाकाहारी हुआ करती थी, और जिन दिनों वह मछली पकाती थीं, जोकि सप्ताह में कम से कम चार दिन होता था, मेरे खाने के लिए कम ही चीज़ें बचती थीं। यही कारण था कि कुछ बरसों बाद मैंने फिर से मॉंसाहारी बनने का निर्णय लिया। पश्चिम में शाकाहारी बनने का अर्थ था बुर्जुआ समाज के जीवन-मूल्यों और मान्यताओं के विरुद्ध प्रतिरोधी आंदोलन का हिस्सा बनना, जबकि भारत में मेरे लिए इसका अर्थ होता समुचित पोषण के अभाव को झेलना और एक तरह से अर्ध-पोषित रह जाना। नाश्ता मुझे ख़ुद बनाना पड़ता था और नौ बरस तक मैंने एक ही चीज़ बनाई : चूड़ा, दही और कदली यानी केला, तीनों को मिलाकर पेस्ट जैसा बना लेती थी। भुवनेश्वर जाने के बाद नाश्ते में दलिया और दूध लेने लगी।
जब मेरी मेज़बान ने तय किया कि वह मुझे केवल दोपहर का खाना देंगी, तब मेरा रात का खाना हो गया, ताज़े टमाटरों से बने सॉस के साथ स्पैगेटी, जिसे मैं एक छोटे-से इलेक्ट्रिक हीटर पर बनाती थी। मैं एक कमरे में रहती थी और वही मेरे लिए किचन था, वही बेडरूम और वही स्टूडियो। उन दिनों कटक में स्पैगेटी नहीं मिलती थी और मेरी मॉं इटली से उसे डाक के ज़रिए भिजवाती थीं। एक बार उन्होंने उस पार्सल में कोको पाउडर का एक छोटा-सा पैकेट भी डाल दिया। शायद कस्टम की चेकिंग के दौरान वह कोको पाउडर, स्पैगेटी पर गिर गया। इस तरह जो चीज़ मेरे पास पहुँची, वह हो गई ‘स्पैगेटी अल चॉकलेटो’ के दो पैकेट, मुझे वह खाना पड़ा क्योंकि वे इतने मूल्यवान थे कि उन्हें फेंका नहीं जा सकता था।

उन दिनों मेरी असली कमज़ोरी थी- दूध; मैं केवल दूध पीकर भी गुज़ारा कर सकती थी। ऐसा लगता था कि कटक में हर कोई यह बात जानता था, क्योंकि मुझे याद है, मैं जिस घर भी जाती थी, वहॉं मेरे लिए दूध का एक बड़ा गिलास हमेशा तैयार मिलता था। उन दिनों कटक में घूमने वाली मैं शायद अकेली ‘विदेशी’ थी, और वह भी मोपेड पर, और कई घरों के लिए यह नाज़ की बात थी कि मैं बिना किसी ख़ास वजह या बिना किसी ख़ास अवसर के, अचानक उनके यहॉं मेहमान बनकर पहुँच जाती थी। मुझे सच में नहीं पता कि कटक में रहने के दौरान मैंने कितने घरों में दूध पिया था; काश, मैं उन सारे घरों को याद रख पाती।
अस्सी के दशक में कटक में बिताए अपने आरंभिक दिनों से ही, मैं सड़कों पर साइकिल, मोटरसाइकिल, बस जैसे वाहनों को देखती, जिन पर नारंगी रंग के थैले लटके हुए होते थे, जिन्हें देख मैं हमेशा सोचती कि इनमें क्या है। ऐसे थैले सबसे ज़्यादा बसों में दिखाई पड़ते थे, लेकिन मोटरसाइकिल चलाने वाले लोग ऐसे थैलों को बड़ी कुशलता से अपने पैरों के बीच संतुलित बनाए रखते थे। मुझे धीरे-धीरे, बाद में पता चला कि ताज़े बने पनीर या छेना से मट्ठे को अलग करने का यह बिलकुल स्थानीय तरीक़ा था। ऐसा इसलिए किया जाता था कि उस पनीर का टेक्स्चर ‘छेना पोड़ा’ नाम की मिठाई बनाने लिए एकदम उचित हो। ये थैले उसी मटीरियल से बने होते थे, जिससे ‘गमछा’ या मोटा सूती कपड़ा बनता है, जोकि ओड़िशा जैसी गर्म और उमस वाली जगह पर लोगों का लगातार साथ निभाता है।
मैं यह क़बूल करती हँ कि उस समय मुझे इस पूरी व्यवस्था की शुचिता और स्वच्छता को लेकर कोई पक्का भरोसा नहीं था, इसमें इतनी लंबी यात्रा होती थी, धूल उड़ती रहती थी, कंटेनरों की हालत खस्ता जैसी होती, इनके कारण संशय होना स्वाभाविक था। लेकिन कुछ समय बाद, जब मैंने इस मिठाई का स्वाद चखा, मैं इसे लेकर निश्चिंत हो गई। इतने अजीब तरीक़े से यात्रा करने वाले छेना से बनी मिठाई, जल्द ही मेरे पसंदीदा व्यंजनों में शामिल हो गई। उसे दिन में कभी भी खाया जा सकता था, मिठाई की तरह, दोपहर बाद के नाश्ते की तरह, रात के खाने में चपाती के साथ, या दोपहर में चावल-सब्ज़ी खाने के तुरंत बाद।

मेरे छात्र अच्छी तरह जानते हैं कि जब भी कोई उत्सव मनाना हो या मुझे खाने की कोई चीज़ भेंट करनी हो, तो उन्हें बस ताज़ा ‘छेना पोड़ा’ ख़रीद लाना है। वे अपने लिए समोसा ख़रीद सकते हैं, आलू चाप, बड़ा, दही-बड़ा, या किसी भी तरह की नमकीन, लेकिन ये लोकप्रिय चीज़ें मेरे लिए नहीं चलेंगी, मुझे तो छेना पोड़ा ही चाहिए।
मैं ख़ुद अच्छा खाना नहीं बनाती, इसलिए मैं यह तो कहूँगी कि मैंने इसे बनाने की कोशिश कभी नहीं की। लेकिन हाल ही में मैं न्यू जर्सी में एक ओड़िया परिवार की मेहमान थी। वहॉं मेरी मेज़बान महिला ने बताया कि अगले दिन आयोजित एक कार्यक्रम में मेहमानों के लिए वह एक बहुत बड़ा छेना पोड़ा बनाने वाली थीं। मुझे यह जान कर बेहद हैरानी हुई कि वह इस चीज़ को घर पर ही बना सकती थीं, वह भी इतने सारे लोगों के लिए, और इतने कम समय में।
तब तक मुझे लगता था कि इसे केवल पारंपरिक चूल्हे पर ही बनाया जा सकता था, क्योंकि पोड़े की ऊपरी सतह का भूरा रंग तब आता है, जब उसे आग पर प्राकृतिक तरीक़े से थोड़ा-सा जलाया जाए। मैंने एक बार ओड़िया खान-पान पर आयोजित एक सेमिनार में इस व्यंजन के पीछे की मूल कथा सुनी थी। कथा के अनुसार, पिछली सदी के मध्य, किसी समय, नयागढ़ ज़िले के दशपल्ला गॉंव में सुदर्शन साहू नाम के एक हलवाई ने देखा कि एक दिन उसके पास छेना बच गया है। उसे समझ नहीं आया कि इसका क्या किया जाए। उसने उसमें थोड़ी चीनी मिलाई और उसे चूल्हे पर रख दिया, जो दिन-भर की ऑंच के बाद अब भी गर्म था। सुबह अचरज के साथ उसने पाया कि उसके ऊपर एक परत बन गई है, और अंदर का हिस्सा नरम व मुलायम है। उसे वह बहुत स्वादिष्ट जान पड़ा। उसके बाद, सुधार करते हुए उसने उसे और बेहतर बनाया और आगे चलकर उसे ‘छेना पोड़ा’ या ‘बर्न्ट चीज़ केक’ नाम से जाना जाने लगा, जोकि ओड़िशा की बेहतरीन मिठाई मानी जाने लगी।

अब हम फिर से न्यू जर्सी वाली मेज़बान पर लौटते हैं। मैं यह जानने के लिए उत्सुक थी कि ओड़िशा से इतनी दूर एक आधुनिक किचन में वह इस मिठाई को कैसे बना पाऍंगी। ताज़े उबलते दूध में नींबू का रस डालकर तब तक पकाया गया था, जब तक कि छेना, पानी या व्हे से अलग न हो जाए। उसे छानने के बाद (मुझे चलती गाड़ियों में लटकी कपड़े की थैलियॉं याद आ गईं), उसमें चीनी और कुछ चम्मच सूजी मिला कर अपने हाथों से ज़ोर लगाकर वह उसे गूँदने लगीं। इसमें चीनी की मात्रा बहुत मायने रखती है। दुकान में बिकने वाली मिठाई कई बार मुझे बहुत अधिक मीठी लगती है। उन्होंने उसमें थोड़ा-सा इलायची पाउडर और गुलाब की कुछ पँखुड़ियॉं डालीं और उसे एक गोले में तब्दील कर दिया।
बर्तन के तल में घी लगाने के बाद, उन्होंने केले के पत्तों की दो-तीन परतें उस पर बिछाईं (उन्होंने मुझे बताया कि ओड़िशा में वह साल वृक्ष के पत्तों का इस्तेमाल करतीं, लेकिन अमेरिका में एशियाई खान-पान की दुकानों में वे नहीं मिलते)। तब मुझे समझ आया कि छेना पोड़ा की सतह पर कुछ गाढ़े निशान क्यों मिलते हैं, मानो उस पर पत्ते की मुहर छाप दी गई हो। उसके बाद उन्होंने उस मिश्रण को एक बर्तन में डालकर हल्के-से दबाया, ताकि वह एक-बराबर फैल जाए। उसके बाद उसे केले के पत्तों की एक और परत से ढँक दिया। उसे पकाने के तापमान और समय-अवधि को सटीक रखना सबसे कठिन काम था। लेकिन मेरी मित्र इसमें काफ़ी माहिर लग रही थीं। उन्होंने ओवन का तापमान पहले 45 मिनट के लिए 350 डिग्री फैरनहाइट रखा और अंतिम पंद्रह मिनट के लिए 375 डिग्री फैरनहाइट कर दिया। मैं सोचती हूँ, पारंपरिक चूल्हे पर बनता, तो कोई इतना सटीक कैसे हो सकता है, जहॉं तापमान का अंदाज़ा धुऍं, गंध और ऑंच से लगाना पड़ता है। उसके बाद उन्होंने केक को ठंडा होने के लिए छोड़ दिया, फिर बर्तन को उल्टा करके केक को बाहर निकाला, ताकि उसकी ‘जली हुई सतह’ ऊपर की ओर आ जाए। उस पर अभी भी सूखा पत्ता चिपका हुआ था, जिसकी छाप उस सतह पर दिख रही थी। अन्य केक के उलट, इसमें कोई ख़ास ख़ुशबू नहीं होती, वैसी ख़ुशबू, जो केक बेक करने पर पूरे रसोईघर में फैल जाती है। जबकि यह तो एक ‘जला हुआ केक’ है, जैसा कि अन्य केक नहीं होते। इसके बावजूद, इसका स्वाद लगभग ‘दिव्य’ होता है। राज्य सरकार ने 11 अप्रैल को, जोकि सुदर्शन साहू का जन्मदिन होता है, ‘छेना पोड़ा दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय भी लिया है।
अब, मैं अपना जन्मदिन एक बड़े छेना पोड़ा केक के साथ मनाती हूँ (उस पर मोमबत्ती लगाए बिना!) मैं उसे पश्चिमी केक की तरह त्रिभुजाकार स्लाइस में काटने के बजाय छोटे वर्गाकार टुकड़ों में काटती हूँ। नहीं, मैं इसे ख़ुद नहीं बनाती। मैं इसे भुवनेश्वर के ओल्ड टाउन की एक दुकान से मँगवाती हूँ, किंतु कौन जाने, यह लेख लिखने के बाद एक दिन शायद मैं इसे ख़ुद बनाने की कोशिश भी करूँ।

