अनुवाद: कनक अग्रवाल
हर घर की एक कहानी होती है और कहानी में होती है एक रसोई, जिस से अक्सर आती है एक आवाज़, ‘आह क्या बात है’!

भोजन और संगीत के बीच क्या संबंध हो सकता है? किसी पंडित या उस्ताद को यह कहते हुए सुनना कोई आश्चर्य की बात नहीं कि ‘वह संगीत कैसे बजाएगा, जिसे ठीक से खाना भी नहीं आता।’ उनका अर्थ यह कि रस के अवशोषण के लिए उस की इंद्रियों का विकास नहीं हुआ, जो की एक कामुक, सुखद, रसिक अनुभव है। सारे प्रशिक्षण, अभ्यास, सीख और समझ के बावजूद वह बेस्वाद हैं, एक इंसान के रूप में अक्षम हैं। बात कठोर है मगर पंडित और उस्ताद कठोर हो सकते हैं।

संगीत सीखने की तुलना कभी-कभी भोजन बनाने की प्रक्रिया से की जाती है। वास्तव में, कई संगीतकारों ने अपने छात्रों को पाक कला सिखाई है। इसके साथ ही सिखाई कुछ महत्वपूर्ण बातें, जैसे, धीरज (धैर्य), प्रमाण (मात्रा), रंग (कच्चे बनाम पके भोजन का रंग), और स्वाद (या रस)। मैंने कई शिक्षकों को भोजन पकाते और अपने छात्रों को खिलाते देखा क्योंकि उनका मानना था कि इस भोजन के माध्यम से संगीत का एक खास पहलू प्रसारित होता है, और उनमें एक नई चेतना जागरूक होती है। कुछ यह भी मानते थे कि भोजन एक नशे या आह्लाद की भावना पैदा करती है, जिससे इंद्रियां अपने काम में लीन हो जाती हैं। निहितार्थ स्पष्ट था – ‘रसास्वाद’ और ‘रसानुभूति’ दोनो ही एक सुरुचिपूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए महत्वपूर्ण थे।

चेंबूर, मुंबई हाउस के 6/20 रुक्मिणी अपार्टमेंट में मेरा जन्म होना महज एक संयोग नहीं था। भारतीय दर्शन कहता है कि आत्मा उस गर्भ को खोजती है जिसे वह पैदा करना चाहती है। यहाँ मैं, एक छोटा सा बालक, विभिन्न स्वादों और सुगंधों से घिरा हुआ था। रत्नागिरी तट से आए मेरी माँ के व्यंजन, मेरे पिता के राजस्थानी, मेरी मामी के मराठा पृष्ठभूमि से। और यही नहीं। हमारे बायें पिल्लई, हमारे दायें सेठना, आगे कर्नाटक से कुंदर, चेन्नई के अय्यर, नीचे मजले पर बंबूट मुस्लिम बोहरा और क्योंकि हम कुल सोलह लड़के और लड़कियां दोस्त थे, हमारी विविधता अय्यर से अयंगर तक, उड़िया से शेट्टी तक, और सामने 17वीं गली पर रहने वाले पंजाबी एवं सिंधी दंपति तक फैली थी।
तब मैं लगभग शाकाहारी था; आप मुझे ब्राह्मण भी कह सकते थे। मेरे घर पर बनते थे मेरे पसंदीदा व्यंजन जैसे भिंडी, आलू, मेथी- दाल और कुछ अन्य सब्जियां। जिस दिन मांसाहारी खाना बनता, मैं फौरन मामा के घर चला जाता और वरन (गुड़ वाली दाल) या आमटी (खट्टी मीठी दाल) के संग आलू खाता। ऐसा हर रविवार होता जब हमारे घर मेहमान आते और मेरे बाबा चिकन पकाते। साथ ही, हर मंगलवार मेरी मामी व्रत रखतीं और फिर शाम के भोग में बड़ा सा भोज बनाती, जिस दावत में शामिल होने वाला मैं अकेला स्वयंभू ब्राह्मण होता।
मैं उस आमटी की खुशबू को बयां नहीं कर सकता, जो निचले मजले से पहली मंजिल तक आती, जिसका पीछा करते – करते मेरी नाक मुझे सीधा मामी के दरवाजे, कमरा नंबर 4 तक ले जाती। उस प्यार से बनाई आमटी की याद मेरे मन में अमिट है, खास कर आज, जब हम मॉल में खाना खाते हैं, जिस पर किसी के हाथों का हस्ताक्षर नहीं होता।
आमटी खाने का अनुभव इतना सुखद होता कि मन मुक्त हो जाता, कला की संवेदना निखर जाती, दिल और दिमाग़ खुल जाते – जैसे एक छोटा सा निर्वाण – अगर मैं कहूं। और इस के बाद आने वाली नींद जैसे चिंतन। मैं आश्चर्य करता हूं कि मेरी मामी बिन चुके हर बार इसे किस तरह बना लेती।

मेरी माँ आलू और हरे मटर से भरे ब्रेड रोल बनाती थीं। साथ ही बनाती थीं कोंबडीवडे, जो नाचनी और गेहूं के आटे के मिश्रण में पालक, पीसे मेथी दाने, जीरा व मेथी के साग को भर कर तैयार करतीं। इनके संग होती भींडी की सब्ज़ी, आलू के परांठे, और मेथी दाल। मां और मामी के घर में फर्क सिर्फ इतना था कि मामी के घर में लियोनार्डो दा विंची से लेकर उत्तर-आधुनिक चित्रकारों के साथ-साथ दुनिया भर के संगीत रिकॉर्डिंग्स की एक सरणी थी, शास्त्रीय से लोक से लेकर जैज़ तक, और हमारे पास केवल शास्त्रीय संगीत था ध्रुपद शैली का संगीत मौजूद था।
नौ साल की उम्र तक मैं चिकन के छोटे-छोटे टुकड़े चखने लगा था, ज्यादातर तंदूरी। जब मैं चौदह साल का हुआ तब मैंने पहली बार मेथी चिकन का स्वाद चखा। मेरे बाबा जानते थे कि मुझे मेथी से खासा प्रेम था और उन्होंने मुझे यह व्यंजन चखने को दिया। मुझे याद है मैंने बड़ी अनिच्छा से उनके प्रस्ताव को स्वीकार किया। तब तक मैंने कई लोगों से सुना था कि मेरे प्रतिष्ठित बाबा बड़े कमाल के खानसामा भी थे। इस बात का एहसास मुझे उस क्षण में हुआ। उस एक कौर ने मानो मेरी इंद्रियों पर जादू कर दिया, पलकों को अधखुला छोड़ दिया और मैं एक असीम आनंद से भर गया। लोग जिस इश्क का महज लिखने या बोलने में जिक्र करते हैं, मैंने पा लिया। मैंने उस दिन चुपचाप खाना खाया और बाकी सब कुछ भूल गया, यहाँ तक कि यह बात भी कि मुझे मांसाहारी खाना पसंद नहीं था।
मेरे बाबा उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर के निधन के बाद, मेरे चाचा और गायक उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर ने मुझे अपनी छत्रछाया में ले लिया। जहां बड़े भाई के लिए प्रमाण ही सबसे महत्वपूर्ण था, चाहे संगीत हो या पाक कला, वहीं छोटे भाई स्वभाव में ही प्रचुर थे, और यही गुण उनके खाने में भी भरपूर झलकता था। वे बड़ी मात्रा में सब्जियां, मांस और मिठाई बनाते और छात्रों एवं दोस्तों को दावत पर बुलाते। ऐसे ही एक मौके पर उस्ताद जी ने मटन तैयार किया। मैंने झट से उन से पूछा – इस व्यंजन का नाम क्या है? वह तनिक से मुस्कुराए और बोले – खा लो। मुझे याद है कि मैंने पहला निवाला अपने मुंह में डाला और जैसे स्वाद का विस्फोट हुआ। मेरे होश भोजन की सराहना करने में विफल थे। मैं रस से सराबोर था। मैंने मुश्किल से तीन – चार ग्रास खाए होंगे। मैं थम गया। यह स्वाद, यह अनुभव अप्रत्याशित था। एक शीतल शांति से अभिभूत, मैं तृप्त महसूस कर रहा था। प्रचुरता का यह एहसास अगले तीन दिनों तक मेरे साथ रहा। उन तीन दिनों में मैंने जो भी संगीत बजाया, ऐसा लगा कि वह सहज बह रहा था।
एक बार नॉर्वे में स्पिक मैके की यात्रा पर हम बच्चों के लिए दस मिनट के छोटे-छोटे कार्यक्रम कर रहे थे। यहां मेरी मुलाकात एक आदमी से हुई जो एक छोटा सा रेस्तरां चलाता था, जिसमें अधिकतम बीस व्यक्ति बैठ सकें। रमज़ान का महीना था और उन्होंने रोज़ा खोलने के लिए भोजन की पेशकश की। जल्दी से कुछ छोले और रोटियां बनाईं। यह खाना उन्होंने लगभग दस मिनट में अपने फ्रीजर से निकाल, तैयार कर, परोसा। सबसे पहला कौर खाते ही मैं अचंभित हो गया। एक फ्रीज़र से निकाले, जमे हुए भोजन को तैयार कर के इतने दिव्य स्वाद से भर देना कैसे संभव था? मेरे साथी सुनंदा और मिथिलेश भी हक्केबक्के एक-दूसरे का मूंह देख रहे थे। वह क्या था जो हमारी समझ के परे था? हमें बाद में पता चला कि वह धन्य सज्जन दरअसल अपने रेस्तरां के पीछे छिपा हुआ एक सूफी था।
मेरी ज़ायके की यात्रा ने मुझे उन क्षेत्रों में पहुँचाया जहाँ मैंने सीखा है स्वीकारना, घुलना, ढूंढना, मिल जाना। मैने सीखा है भेद, प्रतिवाद, विद्रोह, खंडन, अपनी भावनाओं को जाहिर करना और चेतना के वृक्ष के नीचे संतुष्टी पाना। यह सारी सीखें मैंने अन्न से पाई हैं।


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