अंग्रेज़ी से अनुवाद : गीत चतुर्वेदी
भोजन स्मृति है, परंपरा है, और परिवार को एक साथ जोड़े रखने का तरीक़ा है। क्या पकाया जाए, क्या संरक्षित किया जाए और अपने भोजन को किस तरह सँभाला जाए : दक्षिण भारतीय घरों में इनसे जुड़ी प्रथाऍं, धार्मिक मान्यताओं और जीवन से मिले अनुभवों के साथ गहराई से संबद्ध होती हैं। ऐसी ही एक प्रथा है, ग्रहण के दौरान भोजन को सुरक्षित बनाए रखने के लिए ‘दर्भ’ अथवा ‘कुश’ घास का उपयोग करना। यह प्रथा अपने आप में, भोजन की पवित्रता, संरक्षण और देखभाल से जुड़ी तमाम चिंताओं को समेटे रखती है।
हाल ही में, जब चंद्रग्रहण लगा था, मेरे परिवार ने ग्रहण की छाया का सामना करने के लिए एक बार फिर दर्भ घास को इकट्ठा किया था और उसे भिगोया था। उस दौरान मेरे मन में जो विचार उपजे थे, यह निबंध दरअसल उन्हीं का प्रतिबिंब है। घास का एक साधारण-सा तिनका इतनी गहरी और व्यापक बातों का प्रतीक कैसे हो सकता है, यह निबंध इसी बात को याद करने, इसका वर्णन करने और इस पर विचार-विमर्श करने का एक प्रयास है। यह निबंध अतीत की प्रथाओं, पारिवारिक निर्देशों, पड़ोसियों और पुजारियों के साथ हुई बातचीत का एक संग्रह है। मैंने घर के बुज़ुर्गों से बात की, जिन्होंने मुझे बताया कि वे क्या करते थे और क्यों करते थे; ग्रहण के दौरान मैंने अपनी ऑंखों से देखा कि कैसे हमारी रसोई के चारों ओर दर्भ घास रखी गई थी। यह कोई निष्पक्ष निरीक्षण नहीं है, बल्कि इसमें स्नेह और अपनापन भी गहराई से जुड़ा हुआ है। और यह अनिवार्य भी है, क्योंकि सांस्कृतिक स्मृतियॉं अभिलेखागारों में नहीं, बल्कि ऐन रसोईघरों के भीतर जीवित रहती हैं।
आसमान के काला होने से बहुत पहले ही, हमारे घर में, ग्रहण लगने की घोषणा कर दी जाती थी। परिवार का कोई सदस्य तिथि बता देता था, और चुपचाप, पूरा घर तैयारी में लग जाता था। परदे और खिड़कियों के पल्ले कस कर बंद कर दिए जाते थे। पानी के बर्तनों को ढँक दिया जाता था। मंदिर के पुजारी यदि आसपास होते, तो वह दर्भ दे जाते, या कोई पड़ोसी अपने पास उपलब्ध दर्भ ले आता; कभी-कभी वह काग़ज़ में लिपटी हुई आती, उसकी पत्तियॉं कड़क और पीली होतीं।
इस तैयारी में ऐसी लय होती कि संगीत-सा अहसास होता : घास की पत्तियों को भिगोने के लिए एक आदमी पानी से भरा बर्तन रखता; दूसरा व्यक्ति घास को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटता; कोई बच्चा रसोई और बैठक के बीच, लकड़ी का छोटा बर्तन या कटोरी लेकर, दौड़ता रहता। आवाज़ें मद्धम हो जातीं, बातें सावधानी से बोली जातीं, न तो अचानक उठने वाला शोर होता, न ही फ़ालतू की कोई हलचल। यहॉं तक कि हवा भी उसी संयम के हिसाब से बहती थी।
रीति-रिवाज और आयु के अनुसार काम बँटे होते थे; पुरुष अक्सर मंदिर जाकर घास इकट्ठा करते और आवश्यक मंत्रों का जाप करते; स्त्रियॉं घास रखने का काम करतीं, मर्तबानों में घास के टुकड़े बॉंधतीं और मसालों के बीच उन्हें अटका देतीं। काम का यह पारंपरिक बँटवारा, ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का एक तरीक़ा था : बच्चे देख-देखकर सीखते, और बार-बार दोहराने से ये काम, क्रमबद्ध ढंग से, उनके मन में बस जाता था।
एक बार भीग जाने के बाद दर्भ नरम हो जाती है; उसके तेज़ किनारों से उँगलियों के कटने की आशंका कम हो जाती, और वह किसी सरकंडे की तरह नरम होकर मुड़ने लगती। छोटे-छोटे टुकड़े नमक, मिर्च, इमली, तिल के तेल और घी के बर्तनों में डाल दिए जाते; पतली पत्तियों को पापड़ के नीचे रख दिया जाता; लंबे टुकड़ों को मिट्टी के घड़ों या कॉंसे के हंडों के मुँह पर बॉंध दिया जाता। दही, जोकि अपने आप में सूक्ष्म-जीवों का प्रतीक है, उसमें भी घास की एक पत्ती डाल दी जाती, और उसे घर के सबसे अंधेरे कोने में रख दिया जाता।

बड़े-बुजु़र्गों का कहना है कि दर्भ एक तरह के सुरक्षा कवच का काम करती है। कहते हैं कि यह घास, ग्रहण के हानिकारक प्रभावों से भोजन की रक्षा करती है और इसके कारण भोजन के प्राण बचे रहते हैं, जिसे जीवन की आवश्यक शक्ति माना जाता है। बुज़ुर्गों के शब्द कोमल और सटीक थे : यह घास ग्रहण से नहीं लड़ती, बल्कि जीवनदायी चीज़ों की रक्षा करती है।
जब मैं छोटी थी, तब भी इस बात से हैरान होती थी कि मामूली-सी जान पड़ने वाली यह बात अपने आप में कितनी असाधारण थी। इमली का मर्तबान तब तक बेहद मामूली लगता था, जब तक कि एक हरी पत्ती उसमें न रख दी गई हो। दर्भ की उपस्थिति-मात्र से वह मर्तबान एक ऐसी चीज़ में बदल जाता, जिसके एहतियात के लिए क़दम उठाए जा रहे हों।
दर्भ, जिसे कुश भी कहते हैं, का वैज्ञानिक नाम डेस्मोस्टैचिया बाईपिन्नाटा है। यह एक लचीली घास है, जो आमतौर पर मंदिरों के आसपास या सूखे मैदानों में पाई जाती है। यह कठोर होती है और इसके रेशेदार पत्ते जल्दी सड़ते या गलते नहीं हैं। आयुर्वेद और वनस्पति शास्त्र के अनुसार, दर्भ का गुण है कि वह शीतलता प्रदान करती है। रक्तस्राव और सूजन आदि के उपचार में इसका उपयोग किया जाता है। यह एक ऐसा पौधा है, जिसके साथ गहरी प्रतीकात्मकता भी जुड़ी हुई है : ध्यान करते समय आसन के रूप में इसका उपयोग किया जाता है; इसे अंगूठी की तरह पहना जाता है, जिसे पवित्रम कहते हैं और यज्ञ जैसे पवित्र अनुष्ठानों में इसे अर्पित किया जाता है।
वनस्पति विज्ञान और सूक्ष्म जीवविज्ञान के आधुनिक अध्ययनों से पता चलता है कि पारंपरिक पद्धतियों में प्रयुक्त होने वाले कई पवित्र पौधों में जीवाणुरोधी तत्व पाए जाते हैं। तुलसी और नीम इसके दो प्रसिद्ध उदाहरण हैं; दर्भ में स्वच्छता और संरक्षण के सहायक गुण पाए जाते हैं, हालॉंकि इसके प्रमाण अभी पूरी तरह पुख्ता नहीं हो पाए हैं। भंडार में रखे गए भोजन पर दर्भ का रासायनिक प्रभाव भले कम हो, ग्रहण के दौरान भोजन को सीलबंद करके रखने और न छूने से, संक्रमण और कीटों की समस्या निश्चित रूप से कम होती होगी। इस तरह के आसान उपाय वास्तव में कारगर होते हैं।
बड़े-बुजु़र्ग जब ग्रहण से होने वाले रेडिएशन की बात करते थे, तो वे भौतिकी के आधुनिक संदर्भों में उसका उल्लेख नहीं करते थे। वे यह मानते थे कि ग्रहण के दौरान ब्रह्मांड की व्यवस्था में एक तरह का असंतुलन आ जाता था, जिससे पृथ्वी पर प्रभाव पड़ सकता था। इस अवधारणा के अनुसार, भोजन की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त प्रयास करना, दर्भ का प्रयोग करना, बर्तनों को कस कर बंद करना, ताज़ा भोजन बनाने से परहेज़ करना, या उपवास करना; ये सब व्यवाहारिक रूप से सही था। कम से कम, इससे इतना तो सुनिश्चित होता था कि जिस समय लोग उपवास कर रहे हों, सो रहे हों या उनका ध्यान भंग हो रहा हो, उस समय घरवाले ऐसे भोजन पर निर्भर न रहें, जिसे खुला या लावारिस छोड़ दिया गया हो।
इस तरह इस अनुष्ठान के अनेक प्रयोजन थे : लापरवाही के कारण होने वाली बर्बादी से बचाव होता था; घर में होनेवाली गतिविधियों पर विराम लगता था, जिससे सामूहिक स्वच्छता बढ़ती थी; और यह सुरक्षा के कार्यों को एक प्रतीकात्मक अर्थ देता था, जिससे लोग अपने आप इसका पालन करने लगते थे।

बचपन की मेरी एक स्मृति है, जब मैंने इन बातों को नहीं माना था। एक बार, अपनी जिज्ञासा पर लगाम न लगा पाने के कारण, मैं दबे पॉंव खिड़की तक गई, और ढलते हुए चंद्रमा को देखने के लिए अपना चेहरा जाली से सटा दिया। मेरी दादी ने मुझे देख लिया, प्यार से मेरा हाथ पकड़ा, और मुझे रसोई में ले गईं, जहॉं उन्होंने मुझे दही के बर्तन में रखी हुई दर्भ दिखाई। उन्होंने मुझे डॉंटा नहीं, बल्कि वह कहानी बताई, जिसमें संकट के समय हमेशा उस घास को याद किया जाता है। उस शाम, जब परिवार की प्रथा के अनुसार हम स्नान की प्रतीक्षा कर रहे थे, तो उन्होंने धीरे-धीरे गुनगुनाते हुए घास की एक-एक पत्ती हटाई, जैसे पूरी लय में किसी बंधन को मुक्त कर रही हों।
छोटा-सा, घरेलू-सा वह वादा, मेरे लिए सहनशीलता और सामुदायिक संयम का एक पाठ बन गया, सीखने का एक तरीक़ा कि रीति-रिवाज किस तरह हमारे व्यवहार को एक अर्थ से जोड़ देते हैं। ग्रहण के बाद का पहला भोजन किसी उत्सव जैसा लगा, क्योंकि घर के सभी सदस्यों ने शुद्धिकरण की एक छोटी-सी परीक्षा को पार करते हुए उसके लिए अच्छी-ख़ासी प्रतीक्षा की थी।
दक्षिण भारत में ग्रहण से जुड़ी अनेक छोटी-बड़ी प्रथाऍं प्रचलित हैं। तमिलनाडु में अक्सर इमली के मर्तबानों में दर्भ को डाल दिया जाता है और तेल के बर्तनों पर बॉंध दिया जाता है। केरल में आमतौर पर लोग केले के पत्तों से खाने की चीज़ों को ढँक देते हैं और साथ में शुद्धिकरण स्नान करते हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में माना जाता है कि इस समय अचार अधिक संवेदनशील हो जाता है, इसलिए ख़ासतौर पर उसका ध्यान रखा जाता है। कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में, कुओं और पानी के घड़ों में दर्भ या वैसी ही अन्य सुरक्षात्मक सामग्रियॉं डाली जाती हैं।
उत्तर भारत में अलग तरह की प्रथाऍं मिलती हैं : वहॉं दर्भ के स्थान पर तुलसी के पत्तों और प्रार्थनाओं का प्रयोग किया जाता है, कुछ समुदायों में पके हुए भोजन को फेंक दिया जाता है और ग्रहण समाप्त होने के बाद नया भोजन बनाया जाता है। तटीय क्षेत्रों के मछुआरे ग्रहण के दौरान आमतौर पर समुद्र में जाना टालते हैं। यह विविधता हमारा ध्यान इस बात की ओर दिलाती है कि रीति-रिवाज और मान्यताऍं, स्थानीय पर्यावरण और उपलब्ध सामग्रियों के अनुसार ढल जाया करते हैं, अलग-अलग क्षेत्रों में, अलग-अलग तरह के पवित्र पौधे सुरक्षा प्रदान करने की एक जैसी भूमिका निभाते हैं।
पूरी दुनिया में, विभिन्न सभ्यताऍं ग्रहण के प्रति एक सावधान रुख़ अपनाती रही हैं, और इनमें से अधिकांश सावधानियॉं खान-पान से जुड़ी हुई हैं। प्राचीन चीनी ग्रंथों में ग्रहण के प्रति उत्साहपूर्ण वर्णन मिलता है या फिर भयमिश्रित प्रतिक्रियाऍं, जिनमें खानपान के दैनिक रुटीन को भी रोक दिया जाता है। मेटापोटामिया के पुरोहित मानते थे कि ग्रहण, शासक-वर्ग के लिए एक शगुन होता है। लैटिन अमेरिका के कुछ क्षेत्रों में, गर्भवती स्त्रियॉं ग्रहण के दौरान बाहर नहीं निकलती थीं, ताकि वे अपने गर्भस्थ शिुशुओं की रक्षा कर सकें। मध्यकालीन यूरोप में ग्रहण को फ़सलों की सुरक्षा और मवेशियों की चिंताओं से जोड़कर देखा जाता था।
ये घटनाऍं इस बात की ओर संकेत करती हैं कि ग्रहण जैसी नाटकीय खगोलीय घटनाओं ने खानपान, रहन-सहन और मानव शरीर की सुरक्षा के प्रति पूरी दुनिया में लोगों के भीतर सावधानी का भाव जगाया है। जब आसमान में सूर्य और चंद्रमा अपना रूप बदलते हैं, तब भोजन, उसका उत्पादन करने वाले और उसका उपभोग करने वालों की देखभाल, एक सामुदायिक कर्म बन जाती है।
कई घरों में दर्भ को चुपचाप, यूँ ही नहीं रख दिया जाता था, बल्कि उसके साथ कुछ शब्द भी बोले जाते थे, मसलन कुछ छोटी प्रार्थनाऍं, आवाह्न या कुछ साधारण-से मंत्र। ऐसा नहीं था कि हमेशा विस्तृत वैदिक मंत्रोच्चार ही किए जाऍं। अक्सर वे मंत्र छोटे होते थे, जल्दी बोले जा सकने योग्य व्यावहारिक मंत्र। उन मंत्रों में घास से प्रार्थना की जाती थी कि वह भोजन की रक्षा करे, या पितरों का आशीर्वाद लाए। मंदिरों में जब पुजारी दर्भ को काटते और सौंपते, तब वे उसे पवित्र करने के लिए विधिवत औपचारिक मंत्रों का उच्चारण करते थे। यह वाचिक तत्व इस बात की पुष्टि करता है कि घास न केवल एक ढाल थी, बल्कि स्वरों की ऊर्जा से पवित्र हो चुका एक माध्यम भी थी।
दर्भ से जुड़ी भाषा पर ध्यान देना ज़रूरी है, क्योंकि यह घास को निर्देशों की एक मौखिक परंपरा से जोड़ती है कि उसे कैसे रखना है, कितनी देर तक रखना है और कैसे हटाना है। ये निर्देश उन धागों की तरह हैं, जिनसे यह प्रथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक जैसे रूप में बँधी हुई, चलती आती है।
दर्भ आमतौर पर मंदिरों के पास उपलब्ध होती है, दुकानदार इसे बेचते हैं या पुजारी भक्तों को देते हैं। छोटे शहरों में, इसके गट्ठर के गट्ठर मंदिरों की सीढ़ियों पर रखे होते हैं; जबकि बड़े शहरों में तीर्थयात्री आपस में बँधी हुई इसकी छोटी-छोटी लड़ियॉं अपने घर ले आते हैं। खेत से मंदिर और फिर वहॉं से घर तक, सप्लाई की यह पूरी शृंखला यह भी दिखाती है कि पवित्र पौधे किस तरह स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़े होते हैं। घास के मैदानों से दर्भ एकत्रित करने वाले लोग एक ऐसी सेवा करते हैं, जिसका सांस्कृतिक और भौतिक, दोनों तरह का महत्व है।
हालॉंकि इस विनिमय से स्थिरता या सस्टेनेबिलिटी से जुड़े कुछ प्रश्न भी उठते हैं। कुछ क्षेत्रों में, जब त्योहार का मौसम आता है, तब पवित्र पौधों की कटाई हद से अधिक बढ़ जाती है, जिससे स्थानीय वनस्पतियों पर प्रभाव पड़ता है। इसलिए, दर्भ के बारे में होने वाली किसी भी समकालीन चर्चा में उसके टिकाऊ उत्पादन, सामुदायिक देखरेख और नैतिक आपूर्ति जैसे मुद्दों को भी शामिल किया जाना चाहिए कि हम अपनी धार्मिक प्रथाओं और पर्यावरण, दोनों की रक्षा एक साथ कैसे कर सकते हैं।
एक और पहलू जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है, वह यह कि इसमें लगने वाले श्रम का लैंगिक आधार पर विभाजन किया जाना चाहिए। कई घरों में, मंदिर के परिसर से दर्भ लाने और मंत्रोच्चार करने का काम पुरुष करते थे, जबकि रसोई में तैयारी और दर्भ रखने काम स्त्रियॉं करती थीं। अन्य जगहों पर, स्त्रियॉं इस प्रथा के अनुसार भोजन और जल के स्रोतों की सुरक्षा का नेतृत्व करती थीं। यह विभाजन हर जगह एक जैसा नहीं था, लेकिन इससे यह दिखाई देता है कि ये पवित्र सामग्रियॉं किस हद तक हमारी दैनिक अधिकार-व्यवस्था से जुड़ी हुई हैं। पवित्र वस्तुओं को छूने का अधिकार किसे है? मंदिर और घर के बीच मध्यस्थ की भूमिका कौन निभाता है? ये प्रश्न, इस अनुष्ठान में निहित सामाजिक संबंधों और दैनिक व्यवहार के माध्यम से परंपरा की निगरानी किए जाने को उजागर करते हैं।
पारिस्थितिकी और सामाजिकता के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो ग्रहण के दौरान दर्भ का उपयोग करना, अभाव और सुरक्षा के बारे में कई बातें बताता है। नमक, इमली, पापड़, घी जैसे खाद्य पदार्थ उन घरों के लिए अनमोल थे, जहॉं चीज़ों को संभालने के लिए योजना और श्रम की आवश्यकता होती थी। जो प्रथाऍं इन वस्तुओं की साज-सँभाल करती थीं, वे दरअसल अपव्यय को कम करने और निरंतरता को बनाए रखने की व्यावहारिक रणनीतियाँ थीं। घास का एक तिनका अचार के मर्तबान के भीतर भले कोई रासायनिक परिवर्तन न करे, इस प्रथा के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता था कि ग्रहण के दौरान, परिवार अपने खाद्य-भंडार की रक्षा करे, लापरवाही के कारण होने वाले संक्रमण से बचे, और विवेकपूर्ण ढंग से भोजन का उपभोग करे।

फ्रिज, डिब्बाबंद पदार्थों और विभिन्न किस्म के सामाजिक तौर-तरीक़ों के कारण शहरों की जीवनशैली में बदलाव आने लगा है। ऐसे में कई रीति-रिवाज लुप्त होते जा रहे हैं। युवा पीढ़ी इन प्रथाओं को पुरानी और अंधविश्वास से भरी हुई मान सकती है। फिर भी यादें तो बनी रहती हैं : अचार के मर्तबान में रखे हुए दर्भ के तिनके की छवि परिजनों की बातचीत और स्मृतियों में कभी भी उभर आती है। विदेशों में रहने वाले लोग ऐसी यादों और छवियों में अपने मूलस्थान से जुड़ी अनुभूतियों को गहराई से महसूस करते हैं। इनके माध्यम से वे विदेशी रसोई में भी एक नन्हे प्रतीकात्मक घर-जैसा कुछ पा लेते हैं।
प्रथा के लुप्त हो जाने से उसके सबक़ मिट नहीं जाते। अनुशासन, सावधानी और चीज़ों की साज-सँभाल पर ध्यान देना, उपयोगी सबक़ हैं, ख़ासकर एक ऐसे समय में, जब बड़ी मात्रा में खाना बर्बाद किया जा रहा है।
दर्भ की प्रथा के पीछे जो तर्क थे, वे थे- सावधानीपूर्वक साज-सँभाल, भंडार पर ध्यान देना, और अपने समुदाय में समन्वय बनाकर रखना। आज इन तर्कों की प्रासंगिकता बढ़ गई है। जलवायु परिवर्तन के कारण फसलों का चक्र बाधित हो रहा है, आपूर्ति की शृंखलाऍं असुरक्षित हो रही हैं, खाने की बर्बादी वैश्विक चिंता का विषय है। दर्भ की प्रथा का नैतिक सिद्धांत है, खाद्य पदार्थों का महत्व समझना, उनके अपव्यव को रोकना, और इसके लिए सुरक्षा के सरल उपाय अपनाना। ये सब मिलकर एक लचीला मॉडल बनाते हैं। चाहे कोई इसके पीछे मौजूद आध्यात्मिक दावों को माने या न माने, भोजन को संरक्षित करने, सुरक्षित रखने और उसका नवीनीकरण करते रहने की इस सामाजिक प्रथा का, स्थिरता या सस्टेनेबिलिटी के लिए, एक सरल रणनीति के रूप में अध्ययन किया जाना चाहिए।
तमाम जगहों पर दर्भ पौराणिक कथाओं में शामिल है। इन कहानियों में ऐसे ऋषियों का वर्णन है, जो ज्ञान प्राप्त करते समय कुश पर बैठते थे, उन देवताओं का वर्णन है, जिन्होंने इसकी पवित्रता के कारण इस घास को चुना, और उन राजाओं का भी, जिन्हें युद्ध-काल में इस पवित्र घास से बनी चटाइयों से सुरक्षा मिली थी। ये कहानियॉं इस प्रथा को गहराई प्रदान करती हैं कि घास मात्र अपना काम नहीं करती, बल्कि पवित्रता की एक परंपरा का अंग भी है। जब रसोई में बैठकर बड़े-बुज़ुर्ग ये कहानियॉं सुनाते हैं, तब दर्भ घास, साज-सँभाल और संरक्षण की एक लम्बी गाथा का अंग बन जाती है।
अंत में, मैं दही के उस कटोरे की ओर लौटती हूँ, जिसमें घास का एक तिनका रखा है, मैं लौटती हूँ उन छोटी-छोटी भावमुद्राओं की ओर, उन लोगों की ओर, जो साज-सँभाल करते हुए एक घर को आपस में जोड़े रखना जानते हैं। संभव है कि दर्भ, ब्रह्मांड से आने वाली किरणों को न बदलती हो, लेकिन हमें अवश्य ही बदल देती है : यह हमसे धीमे चलने को कहती है, यह हमसे सावधान रहने को कहती है, यह हमसे ‘याद रखने’ को कहती है। एक ऐसे युग में, जहॉं सब कुछ उपभोग कर लेने की जल्दबाज़ी हो, संयमित देखभाल की यह क्रिया, महज़ एक पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि इस बात पर विचार करने का न्यौता है कि अपने भोजन के साथ हम कैसा व्यवहार करते हैं।

