गुन्‍द्रुक : सिक्किम की स्‍वादिष्‍ट विरासत
Volume 5 | Issue 9 [January 2026]

गुन्‍द्रुक : सिक्किम की स्‍वादिष्‍ट विरासत<br>Volume 5 | Issue 9 [January 2026]

गुन्‍द्रुक : सिक्किम की स्‍वादिष्‍ट विरासत
खुशी प्रधान

Volume 5 | Issue 9 [January 2026]

अंग्रेज़ी से अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

सिक्किम में सर्दियों में भरपूर फसल होती है। गुलाबी-लाल मूली, फूली हुई फूलगोभियॉं, ओस से भीगी हुई-सी पत्‍तागोभियॉं, और मोटी-ताज़ा गाजरें, सब्‍ज़ी की हर दुकान पर आपको लुभाती हैं। इनमें सबसे प्रिय वे हरी पत्‍तेदार सब्‍ज़ि‍यॉं हैं, जिन्‍हें न केवल ताज़ा-ताज़ा खाया जाता है, बल्कि कठिन महीनों के लिए सुरक्षित भी रखा जाता है।

इस मौसम में सिक्किम की किसी भी बस्‍ती से गुज़रें, तो आपको धूप में रखी हुई बॉंस की टोकरियॉं दिखाई देंगी, जिनमें फूलगोभी के टुकड़े, मूली और गाजर की कतरनें सजी होती हैं। ये सब जल्‍द ही अचार में बदल दी जाती हैं या भंडारण के लिए सुखा दी जाती हैं। लेकिन इन सभी संरक्षित सब्‍ज़ि‍यों में कोई भी गुन्‍द्रुक जितना सर्वव्‍यापी या सांस्‍कृतिक रूप से महत्‍वपूर्ण नहीं है।

गुन्‍द्रुक, हरी पत्‍तेदार सब्‍ज़ि‍यों से बनाया जाने वाला एक पारंपरिक खमीरयुक्‍त (फर्मेंटेड) भोजन है। इसका उद्गम हिमालयी क्षेत्र से हुआ है, विशेष रूप से सिक्किम, दार्जीलिंग और नेपाल से; और यह इन क्षेत्रों की नेपाली-भाषी समुदायों की खान-पान की विरासत से गहराई से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि ‘गुन्‍द्रुक’ शब्‍द ‘गुन्‍नू’ से आया है, जिसका अर्थ है ‘अरबी का सूखा हुआ डंठल’, जो नेपाल के नेवार समुदाय की भाषा का शब्‍द है (तमांग, 2022)। इसका इतिहास प्राचीन नेपाल तक जाता है, जब कड़कड़ाती सर्दियों के महीनों में हरी पत्‍तेदार सब्‍ज़ि‍यों को सुरक्षित रखना आवश्‍यक होता था (पांचाल आदि, 2024)। खमीर बनाने की प्रक्रिया में ये पत्तियॉं अपने पोषक तत्‍व बनाए रखती थीं और ख़राब होने से बच जाती थीं। साथ ही, इनमें एक दिलकश खट्टा स्‍वाद भी उत्‍पन्‍न हो जाता था (राय आदि, 2018)।

गुन्‍द्रुक बनाना एक ऐसा काम है, जिसका मुझे हर सर्दी बेसब्री से इंतज़ार रहता है। हर साल मेरी मॉं बड़ी सावधानी से मूली, सरसों और फूलगोभी की पत्तियॉं इकट्ठा करके छॉंटती हैं। ये इस प्रक्रिया में इस्‍तेमाल की जाने वाली मुख्‍य पत्‍तेदार सब्‍ज़ि‍यॉं होती हैं। केवल सरसों की पत्तियों से बनाया गया गुन्‍द्रुक हल्‍का और कम खट्टा होता है, इसलिए बहुत-से लोग अपनी पसंद के अनुसार, इन पत्तियों को अलग-अलग अनुपात में मिलाते हैं। पिछली सर्दियों में, मैंने और मेरी मॉं ने बाज़ार से लाई गई फूलगोभी की पत्तियों और हमारे किचन गार्डन की सरसों की पत्तियों को मिलाकर गुन्‍द्रुक बनाया था। चूँकि हमने फूलगोभी की पत्तियों का अनुपात अधिक रखा था, इसलिए हमारा गुन्‍द्रुक थोड़ा ज्‍़यादा खट्टा बना, जोकि हमें पसंद है।

सबसे पहले पत्तियों को छॉंटा जाता है, फिर उन्‍हें अच्‍छी तरह धोया जाता है ताकि सारी मिट्टी और गंदगी निकल जाए। फिर उन्‍हें सुखाया जाता है, फिर तोड़कर ओखली-मूसल में कूटा जाता है। उसके बाद उसे एक एयरटाइट डिब्‍बे में कसकर भर दिया जाता है, जिसे लगभग सात से चौदह दिनों तक किसी गर्म स्‍थान पर रख दिया जाता है, ताकि उसमें खमीर उठ सके। पारंपरिक रूप से, इसे एक गड्ढे में दबाकर जूट की बोरियों और सूखी पत्तियों से ढँक दिया जाता था।

खमीर बनने की प्रक्रिया जब समाप्‍त होने वाली होती है, तब चमकीली हरी पत्तियाँ हल्‍के जैतूनी रंग की हो जाती हैं और बर्तन से तेज़ खट्टी सुगंध आने लगती है। इस स्थिति में मेरी मॉं आमतौर पर स्‍वाद जॉंचती है- अगर वह ज्‍़यादा खट्टा हो जाता है, तो वह इसे जल्‍दी से धो देती हैं; अगर नहीं, तो खमीर उठने के लिए वह पत्तियों को एक-दो दिन के लिए और छोड़ देती हैं। जब यह पर्याप्‍त रूप से खट्टा हो जाता है, तब इन्‍हें ‘नांगलो’ नाम की बॉंस की सपाट टोकरियों पर धूप में सुखाया जाता है। इसके बाद इन्‍हें कस कर पैक कर दिया जाता है, किसी ठंडी और सूखी जगह पर रख दिया जाता है ताकि भविष्‍य में उपयोग किया जा सके।

सूखने के बाद गुन्‍द्रुक कुछ-कुछ काली चाय और सूखे काले मशरूम के मिश्रण जैसा दिखता है और इसकी बनावट खुरदुरी व रस्‍सी जैसी होती है। नए लोगों को इसकी गंध अप्रिय लग सकती है, जैसे गीला भूसा या खलिहान से आने वाली महक, लेकिन सिक्किम के हम लोगों के लिए, जो इसके साथ बड़े हुए हैं, यह सुगंध मुँह में पानी लाने वाली साबित हो सकती है। सूखा गुन्‍द्रुक कच्‍चा नहीं खाया जा सकता; यह चबाने में भूसे जैसा लगता है (अगर आप गाय नहीं हैं, तो आपके लिए यह अनुभव सुखद नहीं होगा)। और इसमें कोई विशेष स्‍वाद नहीं होता, बस हल्‍की-सी खटास होती है। गुन्‍द्रुक की असली सुगंध और स्‍वाद तब खिलकर आता है, जब इसे पकाया जाता है।

गुन्‍द्रुक मुख्‍य रूप से दो तरीक़ों से बनाया और खाया जाता है- अचार और सूप के रूप में। गुन्‍द्रुक का अचार कुरकुरा, मसालेदार और खट्टा होता है, तो किसी गरम सलाद जैसा, एक स्‍वादिष्‍ट ‘एप्‍पेटाइज़र’ जैसा लगता है। सूखे गुन्‍द्रुक को पहले गरम कड़ाही में थोड़े-से सरसों के तेल के साथ तब तक भूना जाता है, जब तक वह कुरकुरा न हो जाए। फिर इसमें बारीक कटा हुआ प्‍याज़, भुने हुए टमाटर की प्‍यूरी, अदरक, लहसुन, ताज़ा हरी मिर्च और नमक मिलाया जाता है। ऊपर से थोड़ा और सरसों का तेल डाला जाता है और कटी हुई धनिया पत्‍ती से सजाया जाता है।

मेरी मौसी इसका एक अलग रूप बनाती हैं, जिसमें वे ताज़ा खमीर उठा हुआ गुन्‍द्रुक इस्‍तेमाल करती हैं, और वह मुझे सबसे अधिक पसंद है। उसमें पारंपरिक अचार जैसा कुरकुराहट नहीं होती, लेकिन पत्तियों में हल्‍का-सा करारापन बना रहता है, जो मुझे किमची की याद दिलाता है। मेरी राय में ताज़े गुन्‍द्रुक की तीखी खटास और गंध, इस व्‍यंजन को और भी स्‍वादिष्‍ट बना देती है। अफ़सोस की बात है कि यह मुझे साल में केवल एक बार ही खाने को मिलता है, क्‍योंकि ज्‍़यादातर गुन्‍द्रुक तुरंत सुखाकर सुरक्षित रख लिया जाता है। शायद उसकी यही क्षणभंगुरता उसे और भी प्रिय बना देती है।

गुन्‍द्रुक का सूप, जिसे स्‍थानीय भाषा में ‘गुन्‍द्रुक को झोल’ कहा जाता है, इन दोनों में शायद अधिक लोकप्रिय है। यह सच्‍चे अर्थों में सुकून देने वाला भोजन है। इसे ऐसे ही भाप में पके हुए चावल के साथ परोसा जा सकता है, या फिर किसी सब्‍ज़ी और टमाटर के भरपूर अचार के साथ। इसे बनाने के लिए पहले एक मुट्ठी गुन्‍द्रुक को गरम पानी में भिगो कर नरम किया जाता है। फिर उसे प्रेशर कुकर में प्‍याज़, आलू, अदरक, लहसुन और उसी भीगे हुए पानी के साथ पकाया जाता है। अलग-अलग घरों में इसकी विधि थोड़ी अलग हो जाती है। उदाहरण के लिए, मेरी मॉं अपने गुन्‍द्रुक के झोल में प्‍याज़ डालती हैं, जबकि मेरी मौसी नहीं डालतीं। कुछ लोग सूप में भुने हुए साबुत सोयाबीन भी डालते हैं, तो कुछ इसके बिना ही बनाते हैं। लेकिन इस बात पर सब सहमत हैं कि गरमा-गरम गुन्‍द्रुक के झोल का एक कटोरा बहती नाक या अपच जैसी परेशानी का अचूक इलाज है। वास्‍तव में, गुन्‍द्रुक विटामिन और खनिजों का अच्‍छा स्रोत है, विशेष रूप से विटामिन सी, आयरन और कैल्शियम का, जो खमीर बनने की प्रक्रिया के दौरान सुरक्षित रहते हैं (पांचाल आदि, 2024)। इसमें जीवाणुरोधी गुण भी पाए जाते हैं और यह एक उत्‍कृष्‍ट प्रोबायोटिक भी है (तमांग एंड तमांग, 2009)।

गुन्‍द्रुक की तीखी गंध और रेशेदार बनावट लोगों को अलग-अलग तरह से प्रभावित कर सकती है। कुछ लोग इसकी खटास की तुलना दक्षिण भारतीय रसम से करते हैं, तो कुछ इसे मिट्टी जैसी या तबेले जैसी बताते हैं। इसकी बनावट, ख़ासतौर पर जब इसे ठीक से नहीं पकाया जाता या सही ढंग से तैयार नहीं किया जाता, तब चबाने में कड़ी या खुरदुरी लग सकती है। फिर भी, इसी खटास के कारण यह सिक्किम के अनेक लोगों को अनोखी और प्रिय लगती है। संसार के कई खमीरयुक्‍त खाद्य पदार्थों, जैसे ब्‍लू चीज़, नट्टो, और किमची की तरह गुन्‍द्रुक भी कोई ऐसी चीज़ नहीं कि पहले ही कौर में सबको पसंद आ जाए। इसका स्‍वाद धीरे-धीरे मन को भाता है, और फिर इसकी तलब लगने लगती है।

भारत जैसे देश में, जहॉं मुख्‍य धारा का खाद्य-विमर्श प्राय: उत्‍तर और दक्षिण भारतीय व्‍यंजनों तक सीमित रहता है, गुन्‍द्रुक जैसे खमीरयुक्‍त भोजन को अक्‍सर ‘बदबूदार’ या ‘बहुत तेज़’ कहकर टाल दिया जाता है। यह भोजन के ‘अन्‍यकरण’ या ‘परायाकरण’ (अदरिंग) का एक उदाहरण है, जो कभी-कभी किसी जातीय पहचान के अवमूल्‍यन के साथ भी जुड़ जाता है (विल्‍चेक-वाटसन, 2019; पोडयाल एंड राय, 2023)। हालॉंकि, अब यह बदल रहा है। आजकल सॉरडो, कोम्‍बुचा और किमची जैसे खमीरयुक्‍त उत्‍पादों की लोकप्रियता बढ़ रही है, और ‘जीवित’ खाद्य पदार्थों के प्रति नया आकर्षण दिख रहा है। गुन्‍द्रुक भी किमची की तरह ही लैक्टिक एसिड के फरमेंटेशन की प्रक्रिया से बनता है, जिसमें प्राकृतिक जीवाणु, शर्करा को लैक्टिक एसिड में बदल देते हैं। इससे भोजन सुरक्षित रहता है और उसका स्‍वाद भी गहरा हो जाता है। हालॉंकि, किमची के विपरीत, गुन्‍द्रुक अधिक सरल और देहाती है। इसमें कोई अतिरिक्‍त सामग्री नहीं मिलाई जाती। केवल पत्तियॉं, माइक्रोब्‍स और समय। इसका स्‍वाद उसी मिट्टा का होता है, जहॉं यह उगा, और इसमें उसी धूप का स्‍वाद होता है, जिसमें यह सूखा। इसका स्‍वाद न तो छिपाया जाता है, और न ही उसे जटिल बनाया जाता है। और यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।

सूखा गुन्‍द्रुक सिक्किमी रसोइयों की आलमारियों में एक अनिवार्य सामग्री है। आजकल यह स्‍थानीय बाज़ारों में आसानी से मिल जाता है, ख़ासकर शहरी क्षेत्रों में, जहॉं लोगों के पास इसे हाथ से बनाने का समय नहीं होता। मैंने स्‍वयं कई बार गुन्‍द्रुक के पैकेट भारत के अन्‍य हिस्‍सों में रहने वाले मित्रों और रिश्‍तेदारों तक पहुँचाए हैं, जो घर के स्‍वाद को याद करते थे। अब तो एक साधारण गूगल सर्च ही काफ़ी है। कई ई-कॉमर्स प्‍लेटफॉर्मों पर गुन्‍द्रुक, आकर्षक, वैक्‍यूम-सील्‍ड पैकेजिंग में बिकता दिखाई देता है। इन पैकेटों पर पारंपरिक, जातीय और प्रामाणिक जैसे विशेषण लिखे होते हैं, जो यह सोचने पर विवश करते हैं कि क्‍या ये लेबल किसी अल्‍पज्ञात उत्‍पाद को अधिक सुलभ बनाने के लिए आवश्‍यक हैं, या फिर से उसकी सांस्‍कृतिक पहचान को हल्‍का कर देते हैं। संभव है, दोनों ही बातें सही हों। जो भी हो, गुन्‍द्रुक ने खमीरयुक्‍त खाद्य पदार्थों की लगातार बढ़ती वैश्विक थाली में अपनी जगह बना ली है।

हालॉंकि, हिमालयी क्षेत्र में गुन्‍द्रुक एक लोकप्रिय सामग्री है, लेकिन रेस्‍तरॉं में इसे प्राय: केवल दो ही रूपों में परोसा जाता है, एक- सूप के रूप में, दूसरे, आरंभिक व्‍यंजन यानी एप्‍पेटाइज़र के रूप में। सोशल मीडिया पर कुछ लोग इसे टैको और डम्‍पलिंग जैसे व्‍यंजनों में मिलाते हुए देखे जा सकते हैं, लेकिन खान-पान की दुनिया में इसके साथ अधिक प्रयोग अभी तक नहीं हुआ है। यह मुझे उस समय की याद दिलाता है, जब नब्‍बे के दशक तक मोमो एक साधारण व्‍यंजन था, जिसे परिवार साथ बैठकर बनाता और खाता था, न कि आज की तरह एक प्रसिद्ध चीज़। अब जब गुन्‍द्रुक अधिक सुलभ हो गया है और खमीरयुक्‍त सामग्रियों की लोकप्रियता भी बढ़ रही है, तो शायद अधिक लोग अपने स्‍वाद की सीमाओं को आगे बढ़ाने को तैयार होंगे। समय के साथ गुन्‍द्रुक भी लोकप्रियता के मामले में उछाल लेगा और भारतीय व्‍यंजनों की सीमाओं को विस्‍तृत करेगा।

गुन्‍द्रुक केवल एक सामग्री नहीं, बल्कि पाक-कला की विरासत है, जो नेपाली समुदाय की कृषि-आधारित जीवनशैली में गहराई से जुड़ी हुई है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी, स्‍थान और समय के पार से, चली आ रही है। कहा जाता है कि जब मेरे पूर्वज लक्ष्‍मीदास प्रधान और उनकी पत्‍नी 1946 के कुख्‍यात कोट नरसंहार से बचने के लिए नेपाल से निकले, तो वे दार्जीलिंग में आकर बस गए और वहॉं गुन्‍द्रुक बेचने का एक छोटा-सा व्‍यवसाय आरंभ किया। कुछ दिनों के अंतराल से, लक्ष्‍मीदास पहाड़ी रास्‍तों से होते हुए दक्षिण सिक्किम के मझीटार तक पैदल जाते, वहॉं से गुन्‍द्रुक ख़रीदते और फिर उसे बेचने के लिए दार्जीलिंग तक वापस लौटते। आगे चलकर वह एक सफल व्‍यापारी बने, और बाद में तत्‍कालीन राजा द्वारा सिक्किम आमंत्रित किए गए, जहॉं उन्‍हें भूमि-राजस्‍व एकत्र करने का कार्य सौंपा गया। अंतत: वह वहीं बस गए। जिस स्‍थान पर लक्ष्‍मीदास गुन्‍द्रुक बेचा करते थे, वह आज भी गुन्‍द्री बाज़ार के नाम से जाना जाता है (श्रेष्‍ठ, 2005)।

यह कहानी उस बड़े आप्रवासी अनुभव का एक छोटा-सा हिस्‍सा है, जब 19वीं शताब्‍दी में नेपाल से सिक्किम और दार्जीलिंग की पहाड़ि‍यों की ओर प्रवासन अपने चरम पर था। दुनिया-भर के अनेक समुदायों के लिए, विशेषकर प्रवासी संदर्भों में, भोजन केवल पोषण का साधन नहीं होता, बल्कि अपनेपन का अहसास देता है और जातीय पहचान का एक महत्‍वपूर्ण चिह्न बन जाता है (एबट्स, 2016)। गुन्‍द्रुक अपने स्‍वभाव से हल्‍का, सघन और साथ ले चलने में आसान है; यह पोषक तत्‍वों से भरपूर है और लंबे समय तक सुरक्षित रहता है। इसलिए यह कल्‍पना करना कठिन नहीं है कि मेरे पूर्वजों सहित अनेक लोग बहुत कम सामान के साथ, और यात्रा के दौरान सहारा देने के लिए थोड़ा-सा गुन्‍द्रुक लेकर, सिक्किम और दार्जीलिंग की ओर निकले होंगे।

मेरे लिए गुन्‍द्रुक केवल एक सामग्री नहीं है। यह पहचान, धैर्य और एक समुदाय की सामूहिक स्‍मृति का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि भोजन हमेशा चमक-दमक का नाम नहीं होता। कभी-कभी यह उपलब्‍ध संसाधनों से काम चलाने, कठिन समय के लिए सुरक्षित रखने और अपनी जड़ों को याद रखने की बात भी होता है। मेरे पूर्वज द्वारा पहाड़ों को पार करते हुए गुन्‍द्रुक का व्‍यापार करना, केवल एक पारिवारिक कथा नहीं, बल्कि पराए देश में संघर्ष और अनुकूलन का प्रतीक है। यह निश्चित रूप से कहना कठिन है कि सिक्किम में गुन्‍द्रुक सबसे पहले कब आया, पर इसकी सर्व-व्‍यापकता इस बात का प्रमाण है कि सिक्किमी भोजन में इसका स्‍थान कितना महत्‍वपूर्ण है।

मेरी मौसी के गुन्‍द्रुक को झोल की रेसिपी:

(4-6 लोगों के लिए)

सामग्री:

– गुन्‍द्रुक – ⅓ कप, कटा हुआ

– पानी (रूम टेम्परेचर पर) – 2 कप

– सरसों का तेल – 2 टेबल स्‍पून

– सोयाबीन – 1 टेबल स्‍पून

– मेथी के दाने – ¼ छोटी चम्‍मच

– सूखी लाल मिर्च – 2 नग।

– आलू – 1 छोटा, छिला और कटा हुआ

– हल्दी पाउडर – ⅓ छोटी चम्‍मच

– नमक – स्वादानुसार

– अदरक लहसुन पेस्ट – 1 छोटी चम्‍मच

– जीरा पाउडर – ½ छोटी चम्‍मच

– धनिया पाउडर – ½ छोटी चम्‍मच

– लाल मिर्च पाउडर – ½ छोटी चम्‍मच

– टमाटर – ½ छोटा, बारीक कटा हुआ

विधि:

  1. कटे हुए गुन्‍द्रुक को एक कप पानी में भिगो दें।
  2. सोयाबीन को धो लें। प्रेशर कुकर में एक टेबल स्‍पून तेल गरम करें। सोयाबीन को मीडियम आँच पर दो मिनट तक भूनें।
  3. भीगे हुए गुन्‍द्रुक को प्रेशर कुकर में डालें और पानी बचाकर रखें। 30 सेकंड तक भूनें और गुन्‍द्रुक और सोयाबीन का मिक्सचर निकाल लें। इसे एक तरफ रख दें।
  4. उसी प्रेशर कुकर में बचा हुआ तेल डालें। मेथी के दाने डालें और इसे लगभग काला होने तक पकने दें। लाल मिर्च डालें और इसे हल्का भूरा होने दें।
  5. कटे हुए आलू, हल्दी पाउडर और नमक डालें। दो मिनट तक भूनें।
  6. अदरक लहसुन का पेस्ट, जीरा, धनिया और लाल मिर्च पाउडर डालें। 30 सेकंड तक भूनें।
  7. कटे हुए टमाटर डालें। तीन मिनट तक भूनें।
  8. गुन्‍द्रुक सोयाबीन का मिक्सचर, भीगा हुआ पानी और बचा हुआ पानी डालें।
  9. दस से पंद्रह सीटी आने तक, या सात से आठ मिनट तक प्रेशर कुक करें। प्रेशर को अपने आप निकलने दें।
  10. ढक्कन खोलें और मसाला व पानी की मात्रा ठीक करें। ताज़े कटे हरे धनिये से गार्निश करें। उबले हुए चावल के साथ परोसें।


सूखी हुई हरी सब्ज़ियों को ओखली और मूसल में पीसना


ताज़ा फर्मेंटेड गुन्‍द्रुक


सूखा गुन्‍द्रुक


गुन्‍द्रुक को अचार

BIBLIOGRAPHY

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