अंग्रेज़ी से अनुवाद : गीत चतुर्वेदी
कृष्णामणि अपने एक कमरे वाले साधारण-से मकान के ढँके हुए बरामदे के सबसे बाऍं कोने में बैठा करती थी, बाग़वानी में इस्तेमाल होने वाली हँसिया उसकी दाहिनी जॉंघ के ठीक पास होती, ताकि ज़रूरत पड़ने पर वह तुरंत ही उसे उठा सके। लोहे की घुमावदार फाल और उसका लकड़ी का हत्था, जो बरसों पकड़े जाने के कारण ख़ासा चिकना हो चुका था, मिट्टी के तेल की ढिबरी की रोशनी में हल्का-सा चमकता था। घर में यह उसकी तयशुदा जगह थी। दिन-भर की मेहनत के बाद वह इस छोटी-सी जगह आकर बैठ जाती थी, जहॉं फ़र्श पर जूट की पुरानी बोरियों को मोड़कर एक चौकोर आसन बना दिया गया था और जिस पर कलकत्ता कॉटन की एक पुरानी चादर की चिंदियॉं बिछी होतीं। शाम होते ही वह इस छोटे-से कोने में अपनी पीठ टिका लेती, दीवार का गोल कोना उसकी पीठ को एक मज़बूत सहारा देता। तब तक वह कई तरह का आटा गूँद कर आपस में मिला चुकी होती, जिससे वह भोरे-भोर तलकर कुछ नाश्ता बनाएगी।
दरअसल, वह सारा आटा एक-सा होता, भले उनका स्वाद एक-दूसरे से थोड़ा अलग हो। वह भीगे हुए चावल और छिली हुई उड़द को एक बड़ी-सी ओखली में कूटती, फिर उसे तीन हिस्सों में बॉंट देती। सादा ‘मुरुक्कु’ बनाने के लिए उसमें जीरा और सफ़ेद तिल मिलाती, मसाला ‘मुरुक्कु’ बनाने के लिए उसमें लाल मिर्च का पाउडर, हल्दी और हींग डालती, और अपनी प्रसिद्ध ‘थट्टई’ के लिए उसमें दरदरी पिसी हुई लाल मिर्च, जीरा, लहसुन, छोटे प्याज़ और करी पत्ते का पेस्ट गूँद देती। वह सूर्योदय से पहले जाग जाती और चूल्हा गरम कर देती थी। सूखे नारियल के छिलकों में लगी ज्वाला जब तक लकड़ी के कुंदों तक पहुँच कर फैलती, तब तक वह आधे से अधिक चीज़ों को तलने के लिए तैयार कर चुकी होती। फिर वह तेल से भरी कड़ाही को गरम करती और आटे की पतली डोरियों को घुमा-मरोड़कर मुरुक्कु के आकार में ढालती और छोटे-गोल टुकड़ों को चपटा आकार देकर थट्टई बनाती। सबकुछ तलने के बाद वह उन्हें पैक करती, फिर उन्हें साइकिल-ठेले पर लाद देती, जो एक ज़माने में उसके पति का हुआ करता था, जब वह आजीविका के लिए नारियल के पेड़ों पर चढ़ा करता था। साइकिल पर पैडल मारती वह गली में आगे बढ़ती, बाऍं मुड़ती और ‘बस्स्टेंट’ (बस स्टैंड) जाती, जहॉं लोग-बाग़ उसे जानते और मानते थे। स्कूल के बच्चों की भीड़ इकट्ठा होने से थोड़ी देर पहले ही वह वहॉं पहुँच जाती थी। फिर दफ़्तर जाने वाले की भीड़ जुटती। उसके बाद दोपहरी की सुस्ती छा जाती। तब तक उसका अधिकांश सामान बिक चुका होता। वह थोड़ी देर और वहीं ठहरी रहती, ख़ासकर उन गृहिणियों के लिए, जो शहर के मध्य-भाग में स्थित पार्वती मंदिर से लौटते हुए उसके ठेले पर रुकती थीं। फिर साइकिल पर सवार होकर वह घर की ओर लौटती, रास्ते में सब्ज़ी वालों के पास रुकती। उस समय तक उनकी भी अधिकांश सब्ज़ियॉं बिक चुकी होतीं, और बचे हुए सामान को वे उसे सस्ते में दे देते थे। कुछ देर वहीं रुक कर वह उनके साथ गपशप करती और अपने पास बची हुई चीज़ों में से कुछ उन्हें खिलाती।

जब उसकी उम्र अधिक नहीं थी, वह दिन में दो बार वहॉं का चक्कर मारती थी। दोपहर का खाना खाने के बाद फिर से नाश्ते की चीज़ें तलती और उन्हें लेकर साइकिल चलाते हुए शाम के भीड़-भाड़ वाले समय के लिए वापस ‘बस्स्टेंट’ पहुँच जाती। उसने सोचा था कि शाम का काम वह उन भले और बेरोज़गार नौजवानों से करवाएगी, जो अक्सर उसके घर के बाहर गली में घूमते रहते थे, लेकिन कृष्णामणि आसानी से किसी पर भरोसा नहीं कर पाती थी। यदि उन्होंने उसे धोखा दे दिया, तब? या लापरवाही में उसके अनमोल ठेले को नुक़सान ही पहुँचा दिया, तब? और वैसे भी, इन दिनों एक चक्कर ही उसके लिए पर्याप्त था। अतिरिक्त पैसे मिल जाते, तो काम ही आते, लेकिन अब ऐसा तो नहीं था कि उसे अपने बच्चों के स्कूल की फीस भरनी हो। वे अब बड़े हो चुके थे और अपनी-अपनी राह जा चुके थे।
तो इस तरह, जो भी सब्ज़ियॉं मिलतीं, कृष्णामणि उन्हें लेती हुई घर लौटती और फिर अपने लिए खाना बनाती। पति घर पर होता, तो कुछ अधिक चावल उबाल लेती, वरना केवल उतना ही पकाती, जितना स्वयं उसके लिए पर्याप्त हो। ‘बस्स्टेंट’ से लौटते हुए कभी-कभी उसे इतनी सामग्री मिल जाती कि वह अवियल बना सके। यह एक दुर्लभ दावत जैसा होता, क्योंकि अवियल बनाने और खाने से अधिक ख़ुशी उसे किसी बात में न मिलती। उसका एक विनम्र अनुमान था कि वह संसार का सबसे अच्छा अवियल बनाती थी। और ऐसा इसलिए मानती थी कि वह अवियल हेतु आवश्यक साधन-सामग्री और उसे बनाने की श्रमसाध्य विधि के मामले में किसी तरह का कोई समझौता नहीं करती थी। आप अवियल अपनी मनमर्ज़ी की किसी भी चीज़ से नहीं बना सकते। उसमें कठोर और कोमल सब्ज़ियों का सही संतुलन होना आवश्यक होता है। उसमें सहजन की फलियॉं, सूरन, कच्चा केला और छोटे गोल बैंगन होने चाहिए। बड़े बैंगन से आसानी हो सकती है, लेकिन उसमें वह मज़बूती नहीं होती, जो अवियल के लिए चाहिए होती है। यही नहीं, जिस नारियल का इस्तेमाल करें, वह भी थोड़ा कच्चा होना चाहिए। अगर नारियल कठोर और पुराना हुआ, तो खाने के बाद मुँह में उसके तेल का अप्रिय-सा स्वाद और एक अजीब-सा दानेदार अहसास बना रहेगा। उसने अधिकांश व्यंजन अपनी मॉं और नानी से सीखे थे, लेकिन अवियल की यह रेसिपी ऐसी थी, जिस पर उसने बरसों काम किया था और उसे निखारते हुए बेहतर बनाया था।

उसके पति को भी उसका बनाया अवियल पसंद था। सच बात तो यह है कि बरसों से उनके बीच जो थोड़ा-सा संबंध बचा था, उसमें अधिकांशत: खाने की ही भूमिका थी। वैवाहिक जीवन का रोमांस दोनों के लिए ही अल्पजीवी था। उनकी पहली संतान हुई। पहली ही संतान के लड़की होने की निराशा कुछ समय तक उनके घर में छाई रही, और जब तक वह छँटती, दूसरी संतान भी लड़की ही हो गई। फिर एक गर्भपात हुआ, और फिर एक लड़की हो गई। उसके बाद पति का हर रोज़ शराब पीकर घर आना एक आम बात हो गई। जब उसमें ताक़त होती, वह अपनी सारी हताशा और कड़वाहट बिस्तर पर चित पड़ी कृष्णामणि में उतार देता, मात्र इस उम्मीद में कि किसी तरह एक बेटा पैदा हो जाए। एक और लड़की को जन्म देने और फिर तीन और गर्भपातों के बाद कृष्णामणि ने एक बेटे को जन्म दिया। तब एक राहत-भरा समय आया। जबर्दस्ती या नफ़रत-भरा व्यवहार बंद हो गया, क्योंकि बेटा पैदा करने का मक़सद पूरा हो चुका था। पति ने भी कुछ समय के लिए अपने तौर-तरीक़ों में सुधार लाने का प्रयास किया और शराब कम पीने लगा। उसने अपने बच्चों में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी, ख़ासकर नवजात बेटे में, लेकिन पूरे होशो-हवास में ली गई इस दिलचस्पी के दौरान एक बात उसे जल्द ही समझ में आ गई कि बच्चों को पालना बेहद महँगा काम है। पति का मुख्य काम था पेड़ों पर चढ़कर नारियल तोड़ना। साथ में नारियल के रेशे और ताड़ के पत्ते जैसी चीज़ें भी इकट्ठा करता और उन्हें बेचकर कुछ कमाई कर लेता था। लेकिन देश की स्वतंत्रता के लगभग डेढ़ दशक बाद, प्रगति के तमाम वादे युद्ध की ऑंच में झुलस गए थे और कृष्णामणि और उसके पति जैसे अनेक लोग ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ के मिश्रण में कहीं खो-से गए थे। केरल के कम्युनिस्टों को उनसे सहानुभूति तो थी, लेकिन उनकी उधार ली हुई सोच का दायरा केवल कारख़ानों के मज़दूरों और किसानों तक ही सीमित था, और ये दोनों उनमें से नहीं थे। ऐसे कठिन समय में पति के पास बस यही रह गया था कि वह उस पैसे से, जो उसके पास था ही नहीं, ताड़ी की स्थानीय दुकान के मालिक की जेब भरता रहे।
इससे एक अजीब क़िस्म की दैनिक रस्म की शुरुआत हुई। पति नशे की हालत में घर लौटता और कृष्णामणि को पीटते हुए पैसे मॉंगता, ताकि वह ताड़ी वाले का क़र्ज़ा चुका सके। तब तक कृष्णामणि ने नाश्ते बेचने की शुरुआत नहीं की थी। देने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे, इसलिए वह मार खा लेती थी। उसके पास जो भी थोड़ा-बहुत सोना था, उसने पति को वह गिरवी रखने दे दिया। हालाँकि वह अपने कान की बालियॉं नहीं देना चाहती थी। सहजन के फूलों के आकार की वे छोटी-सी, सोने की बालियॉं उसकी नानी की निशानी थीं। जब उसके पति ने उन बालियों को उसके कानों से नोंचने की कोशिश की, तब कृष्णामणि ने उसे दॉंतों से काट लिया, नाख़ूनों से खुरच डाला। इससे पति के हाथों से ख़ून निकल आया, तिस पर उसने कृष्णामणि को ज़ोर-से थप्पड़ मारा और उसके गले में पड़ी पतली-सी चेन को लेकर ही माना।
जब वह पैसे कमाने लगी, यह सबकुछ बदलने लगा। अब उसे पिटाई सहने की कोई आवश्यकता नहीं थी। पास में पैसे होने का अर्थ यह था कि उसके पास ऐसी चीज़ थी, जो उसके पति को चाहिए थी और अब, वह उसे देने के लिए मजबूर नहीं थी। उसे अब भी वह रात याद है, जब वह रस्म शुरू हुई थी। दिन-भर का काम निपटाने के बाद बाग़वानी वाली हँसिया अपने पास रख वह चुपचाप बैठी हुई थी। ताड़ी पीकर जब वह लौटा और उसे पीटने के लिए आगे बढ़ा, उसने ख़ामोशी से अपना हाथ उठाया और हँसिये का हत्था उसके गले पर लगाकर उसे पीछे धक्का दे दिया। एक पल के लिए वह घबराकर पीछे हटा, लेकिन नशे की हालत में भी थोड़ा सँभलते हुए उसने उस पर फिर से झपट्टा मारा। कृष्णामणि ने पूरी शांति किंतु मज़बूत इरादे के साथ हँसिया उसकी ओर लहरा दिया। वह सही समय पर पीछे हटा और बाल-बाल बचा। कृष्णामणि ने हँसिया फिर लहराया, फिर लहराया, वह लहराती रही, जब तक कि उसे यह अहसास न हुआ कि असल में वह उसे पूरे ऑंगन में दौड़ा रही है। जान बचाने के लिए अंतत: वह, ऑंगन के कोने में उगे नारियल के पेड़ पर चढ़ गया और वहीं से ज़ोर-ज़ोर से गालियॉं देने लगा।
यह उनकी रातों की रोज़ाना रस्म बन गई। शुरू में बच्चे यह सब देखकर चिंतित हो गए और पड़ोसियों को इस तमाशे में मज़ा आने लगा, लेकिन जैसा कि हर नई चीज़ के साथ होता है, इसका नयापन भी ख़त्म होकर एक आदत में बदल गया। इस रस्म के शुरू होने के बरसों बाद, जब बच्चे बड़े होकर दूर चले गए थे, कृष्णामणि अपनी तयशुदा जगह पर बैठी हुई थी। उसने अपनी वफ़ादार पुरानी हँसिया को हमेशा की तरह अपने पास रखा था कि कहीं उसका पति पेड़ से उतरकर उस पर फिर से हमला न कर दे। उसने बीड़ी सुलगाई और कुछ कश लिए। दोपहर से लगातार बारिश हो रही थी। उसे झपकी आने लगी थी, जो धप्प की एक भारी आवाज़ से टूटी। उसने ध्यान नहीं दिया, यह सोचकर कि शायद कटहल या नारियल गिरा हो। तभी पड़ोस की लड़की की चीख सुनाई दी। उस धारासार बारिश में कृष्णामणि धीरे-धीरे बाहर ऑंगन में आई और तेज़ आवाज़ में पूछा,
‘क्या हुआ री, लड़की? इतना क्यों चिल्ली रही है?’
वह चलते हुए अंधेरे से भरी उस जगह तक पहुँची, जहॉं उस लड़की का साया खड़ा था। उसने फिर पूछा कि क्या हो गया। लड़की ने नीचे ज़मीन की ओर इशारा किया और अटकते हुए कहा,
‘वो मर गए… अंकल मर गए।’
कृष्णामणि ने नीचे देखा और कुछ पलों की चुप्पी के बाद उसके मुँह से बस इतना निकला,
‘अरे, हद है!’
उसका बेटा त्रिवेंद्रम में रहता था और पिता के दाह-संस्कार के लिए समय पर पहुँच गया। बड़ी बेटी अपने पति और दो बच्चों के साथ तेरहवीं से एक दिन पहले कलकत्ता से आई। दो छोटी बेटियों की शादी गल्फ़ में हुई थी। वे साल के अंतिम महीनों में आने वाली थीं। ज़्यादा मेहमान नहीं थे, इसलिए तेरहवीं के खाने की सारी तैयारी घर पर ही हुई। हाथ बँटाने के लिए पड़ोस की लड़की आ गई। कृष्णामणि ने ज़ोर देकर कहा कि अवियल बनाया जाए। उसने सबसे पहले कठोर सब्ज़ियॉं डालीं, कच्चे केले, सूरन, सहजन की फलियॉं, सबको छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा, साथ में कटहल के बीज लिए और इन सबको नमक, हल्दी और करी पत्ते वाले उबलते पानी में डाल दिया। जब एक उबाल आया, उसने दो पूरे नारियल की नरम गिरी को लहसुन, जीरा और हरी मिर्च के साथ पीसकर पेस्ट बना लिया। जब कठोर सब्ज़ियॉं आधी पक गईं, उसने छोटे बैंगनों के टुकड़े, बराबर आकार में कटे हुए कुम्हड़े, कतरी हुई प्याज़ और इमली का गूदा उसमें डालकर अच्छी तरह उसे चलाया। जब सारी सब्ज़ियॉं नरम हो गईं, उसने उसमें नारियल का पेस्ट मिला दिया। मिश्रण में उबाल आया, तो उसने एक छोटे बर्तन जितनी दही मिलाई और ऊपर से थोड़ा नारियल तेल डाला। फिर बर्तन पर ढक्कन रखकर ऑंच से उतार दिया, ताकि अंदर के ताप से उसमें एक अलग स्वाद पनपता रहे। यह सब करते हुए वह सुन रही थी कि उसका बेटा, बड़ी बेटी और दामाद धीरे-धीरे फुसफुसाते हुए इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि अब उसका और इस घर का क्या होगा।

*छवि – एस. सतीश कुमार
