– अंग्रेज़ी से अनुवाद : गीत चतुर्वेदी
आज का लंच कुछ ऐसा था, जिसकी प्रतीक्षा मैं पूरी अधीरता के साथ कर रहा था। कई दिनों से मुझे अपने पसंदीदा ‘तांबड़ा रस्से’ का स्वाद चखने को नहीं मिला था। यह खाने की वह चीज़ है, जो मेरे मूड को तुरंत अच्छा कर देती है। मटन का सबसे नरम टुकड़ा, जो धीरे-धीरे पका हो, मसालों की संगत में पूरी तरह डूबा हुआ, और उस पर महाराष्ट्रीयन गोडा मसाला की हल्की तीखी सुगंध, सच में ‘शेफ्स किस’ जैसा लगता है। अजीब बात है कि शब्द कभी-कभी कितने धोखादेह होते हैं। हम ऐसी जटिल और स्वादिष्ट चीज़ को अपने राज्य का साधारण खाना कैसे कह देते हैं। (ये सब विचार जल्दी-जल्दी मेरे दिमाग़ में घुमड़ रहे थे, जब मैंने अपना लंचबॉक्स खोला और पहला कौर खाने ही वाला था।)
भारतीय खाने की एक सुंदरता यह है कि हर व्यंजन अपने आप में सम्पूर्ण और संतुलित होता है, उसमें हर चीज़ की अपनी भूमिका होती है। यहॉं तक कि राई के सबसे छोटे दाने तक की। और हालाँकि इस खाने का असली सितारा हमेशा रस्सा ही रहा है, लेकिन मैंने शायद ही कभी रुक कर सोचा हो कि मैं ज्वार की इस भाकरी को कितनी आसानी से, कितना हल्का ऑंकता हूँ। उस छोटे-से टुकड़े की हल्की मिठास, मसालों के तीखेपन को जिस तरह नरम कर देती है और हर कौर को संतुलित बना देती है, यह सच में उन अहसासों में से है, जो आपको तभी समझ में आते हैं, जब आप ध्यान से खाना खाते हैं।
मैं अपनी मेज़ पर बैठा यह सब सोच ही रहा था कि यह रोटी सिर्फ़ स्वाद में ही नहीं, बल्कि अपने इस्तेमाल में भी कितनी कमाल की है। भाकरी को जिस तरह गोल और सही आकार में बनाया जाता है, वह अपने आप ही हर तरह की सब्ज़ी या रस्से को उठाने के लिए एक अच्छा-सा ‘स्कूप’ बन जाती है। तभी मैंने देखा कि मेरे आसपास ओवन से ताज़ा बेक किए हुए सॉरडो के लोफ़, चमकदार बैगल्स के बैच और सुंदरता से गूँदी हुई चाल्लाह ब्रेड बाहर निकल रही थी। ताज़ा ब्रेड की सुगंध के बीच बैठकर भरपेट खाना खाने का अपना ही सुख होता है। लेकिन ठीक उसी समय, मेरे मन में एक सवाल भी उठा : आख़िर दुनिया में पॉंच हज़ार से ज़्यादा तरह की ब्रेड कैसे बन गईं? ब्रेड का विकास कैसे हुआ? क्या ब्रेड हमेशा से ऐसी ही थी, जैसी आज है?

कहा जाता है कि कोई भी चीज़, जिसमें आटा, पानी, नमक और कभी-कभी फूलने के लिए कोई तत्व मिलाया जाए, तो उसे ब्रेड कहा जा सकता है। लेकिन प्राचीन मिस्र के बेकर्स जिन्होंने ग़लती से फरमेंटेशन यानी खमीर उठाने की कला खोजी थी, उनसे लेकर औद्योगिक क्रांति के कारण प्रसिद्ध हुई आज की सैंडविच ब्रेड तक, ब्रेड की कहानी बहुत लम्बी यात्रा तय कर चुकी है। बुनियाद वही रहती है, लेकिन हर जगह की ब्रेड अपने क्षेत्र की संस्कृति को अवश्य दिखाती है। उसका आकार कैसा है, उसमें कौन-से पदार्थों का उपयोग किया गया है, उन्हें खाने के किन पारंपरिक रूपों के साथ खाया जाता है, ये सब बातें हमें मनुष्य की जिजीविषा, उसके समुदाय, भूगोल, धर्म और परंपराओं के बारे में बताती हैं। नदी के किनारे गर्म पत्थरों पर फ्लैटब्रेड पकाने से लेकर, आज के इलेक्ट्रिक ओवन में बिल्कुल एक जैसे सफ़ेद चौकोर ब्रेड टिन में बेक करने तक, हमने ब्रेड को अधिक टिकाऊ, आसान और सुविधाजनक तो बना लिया है, लेकिन फिर भी यह सोचने लायक़ बात है कि एक ऐसा हुनर, जिसे सीखने में कभी बेकर्स को बरसों की मेहनत लगती थी, वह आज प्लास्टिक के पैकेट में बंद एक आम चीज़ कैसे बन गया, जिसे आप फोन पर बस एक उंगली से छूकर मँगा सकते हैं।
वैसे भी, भारत में हमेशा से ही ब्रेड का अस्तित्व रहा है। सबसे नरम इडली से लेकर गुजराती ढोकला तक, अमृतसरी कुलचे से लेकर गोवा के पाव तक, ये सब भी तो एक तरह की ब्रेड ही हैं। फिर भी, कई दशकों तक हमें यही सिखाया गया कि ब्रेड एक पश्चिमी चीज़ है। भारतीय खाने पर औपनिवेशिक प्रभाव से जुड़ाव के कारण, ब्रेड को लम्बे समय तक नापसंद किया गया। 1960 के दशक की शुरुआत में ब्रेड को लेकर कुछ दुर्भाग्यपूर्ण धार्मिक पूर्वाग्रह भी पैदा हो गए थे। परंतु, तेज़ी से बदलते और आधुनिक होते देश के लिए स्लाइस्ड ब्रेड की सुविधा को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल था। धीरे-धीरे यह घर-घर में एक सामान्य चीज़ बन गई, बिल्कुल वैसे ही, जैसे चावल या चायI

यह भी दिलचस्प है कि आरंभ में मॉंएं इसे टोस्ट करती थीं, इसमें मसाले डालती थीं, या अंडे में डुबोकर इसे ‘भारतीय शैली’ में बनाती थीं। जो चीज़ कभी विदेशी मानी जाती थी या कुछ लोगों के लिए ज्यों लगभग अपवित्र थी, वही धीरे-धीरे हर स्कूल के टिफिन में और हर आम आदमी के नाश्ते में जगह बनाने लगी। पाव-भाजी और वड़ा-पाव जैसे हमारे पसंदीदा खानों से लेकर आज के नए प्रयोगों जैसे सॉरडो सैंडविच तक, ब्रेड ने एक लम्बा और घुमावदार सफ़र तय किया है।
ब्रेड और उसकी विविधता के प्रति यही आकर्षण था, जिसने मुझे खुद बेकिंग करने की तरफ़ अग्रसर किया। एक बायोमेडिकल इंजीनियर के रूप में, जो सस्ते और सर्वसुलभ मेडिकल उपकरण बनाने पर काम करता है, बेकिंग की दुनिया में मेरा कदम रखना शायद अत्यंत अप्रत्याशित बात थी। लॉकडाउन के दौरान जो चीज़ घर के माइक्रोवेव ओवन में बेकिंग के एक छोटे-से प्रयोग की तरह की गई थी, वही आगे चलकर एक ऐसे उद्यम में बदल गई, जिसने पुणे शहर के लोगों के ब्रेड को देखने के तरीक़े को सच में बदल दिया। मेरे लिए यह कभी कमज़ोरी नहीं रही कि मैं इंजीनियर हूँ, बल्कि फरमेंटेशन के पीछे छिपे विज्ञान को गहराई से समझने की मेरी लगातार जिज्ञासा ही वह चीज़ है, जिसने मुझे सबसे अलग बनाया है।
महामारी के बाद जब पर्यटन फिर से शुरू हुआ और लोग विदेश में रहने के बाद वापस भारत आने लगे, तब बहुत-से लोगों को दुनिया-भर की अलग-अलग तरह की ब्रेड चखने का मौक़ा मिला। कुछ लोगों ने तो उन्हें अपने रोज़ के खाने का हिस्सा भी बना लिया। लेकिन यह मुश्किल था कि लोगों को अपने ही शहर में किसी भरोसेमंद जगह से ब्रेड मिल सके। यही बात, अंतत:, मेरे उद्यम ‘क्रस्टवर्थी’ की नींव बनी।
निस्संदेह, बायोमेडिकल इंजीनयिरिंग से अपना ध्यान हटाकर ऐसे क्षेत्र में आना, जिसके बारे में मैंने पहले कभी सोचा भी नहीं था, आसान नहीं था। असल में, लॉकडाउन के दौरान ही, मैं पहली बार वह चीज़ ख़रीदने के लिए बाहर निकला था, जिसे ‘यीस्ट’ कहा जाता था। रोज़मर्रा जैसे एक चमकीले रविवार की सुबह, मैंने अपने भीतर के नए-नवेले गॉर्डन रैम्से को, मानो शिद्दत से महसूस किया, और चाल्लाह बनाने का फ़ैसला किया। चाल्लाह यानी यहूदी अश्केनाज़ी परंपरा की एक ब्रेड, जिसके बारे में मैंने यूट्यूब पर देखा था। (#जस्टलॉकडाउनथिंग्स)
लेकिन उसके बाद जो हुआ, वह था, ऐसे कई नए विचारों और शब्दों के बीच रास्ता खोजने की कोशिश, जिनके बारे में मैंने पहले कभी सोचा भी नहीं था। हालॉंकि उसका विज्ञान मुझे अत्यंत परिचित और सहज लगा। मैंने उस ब्रेड को घर के साधारण माइक्रोवेव ओवन में ही बेक किया, उसमें कुछ भी ख़ास या महँगा नहीं था, और वह किसी तरह ठीक-ठाक और खाने लायक़ बन गया था। यक़ीन कीजिए, जब आप पहली बार बेकिंग कर रहे होते हैं, तो इतनी-सी कामयाबी भी एक बड़ी उपलब्धि के समान होती है। मुझे आज भी याद है, मेरे माता-पिता उस ब्रेड के साथ खड़े होकर तस्वीरें खिंचवा रहे थे, उनकी ऑंखों में अपने बच्चे की छोटी-सी उपलब्धि पर गर्व साफ़ दिखाई दे रहा था, जो बस रसोई में यूँ ही कोई प्रयोग कर रहा था। लेकिन पहली सफलता, भले छोटी-सी, आपको आगे सक्रिय रहने की जितनी प्रेरणा देती है, उतनी किसी और चीज़ से नहीं मिलती; और मैंने भी वही किया।

हीब्रू भाषा की एक कहावत है, जिसे मेरे पसंदीदा बेकर्स में से एक, रॉय श्वार्टज़ापेल अक्सर इस्तेमाल करते हैं। उसका अर्थ है, ‘जिसे नाचना नहीं आता, वह कहता है कि फ़र्श टेढ़ा है।’ अक्सर ऐसा होता है कि जब हम किसी चीज़ की शुरुआत कर रहे होते हैं, तो अपनी असफलताओं के लिए किसी और चीज़ को दोष देने लगते हैं, बजाय इसके कि यह स्वीकार करें कि हम उस काम में बहुत अच्छे नहीं हो पाए हैं। जब मैंने पहली बार ठीक-ठाक सॉरडो बनाया, तब तक मैं उससे पहले 14 बार असफल हो चुका था। लेकिन वही असफलताऍं थीं, जिन्होंने हर बार मुझे थोड़ा-थोड़ा बेहतर बनाया। मुझे ख़ुशी होती थी कि मैं हर बार एक नई ग़लती कर रहा हूँ, क्योंकि वह कुछ नया सीखने का मौक़ा होता था। सच कहूँ, तो मुझे लगता है कि किसी चीज़ में अच्छा न होना भी एक उपहार है, क्योंकि हर दिन आप उठते हैं और समझते हैं कि आज कुछ नया सीखने को मिलेगा। मुझे उम्मीद है कि अधिकांश लोग जीवन को भी एक ऐसे उपहार की तरह देखना शुरू करेंगे, जिस पर लगातार काम करते रहना चाहिए।
हमारी योजना हमेशा यही रही कि क्रस्टवर्थी को ब्रेड से जुड़ी हर चीज़ के बारे में बनाया जाए। एक अच्छी ब्रेड को ख़ास बनाने वाली बारीकियों को गहराई से समझना, सबसे साधारण सामग्री की भी सर्वोत्तम गुणवत्ता सुनिश्चित करना, और उन लोगों के लिए भी ब्रेड को आसान और सहज बनाना, जिन्होंने अभी तक दुनिया की अलग-अलग ब्रेड का अनुभव प्राप्त नहीं किया है। ग्राहकों की प्रतिक्रिया को समझकर उसे उपयोगी सुझावों में बदलना, किसी भी अच्छे उद्यमी की एक महत्वपूर्ण खूबी होती है। लेकिन एक घटना ऐसी है, जो मुझे ख़ासतौर पर याद है, क्योंकि उसने इस उद्यम को देखने का मेरा नज़रिया ही बदल दिया। एक बार एक ग्राहक ने हमसे शिकायत की कि सॉरडो की एक स्लाइस का स्वाद ठीक नहीं लग रहा था। थोड़ी बातचीत के बाद पता चला कि उस सज्जन ने उसे चाय में डुबोकर वैसे ही खा लिया था। ठेठ भारतीय तरीक़ा। और यह उनके लिए बेहद स्वाभाविक भी था। सुनने में मज़ेदार, लेकिन मेरे लिए यह उस बाज़ार की एक शानदार केस स्टडी थी, जिसमें हम काम कर रहे थे।
मुझे यह समझ में आया कि ब्रेड, जिसे आमतौर पर पश्चिमी दुनिया का उत्पाद माना जाता है, उसे भारतीय खाने की आदतों के अनुसार ढालना ही असली चुनौती है। मुझे लगता है कि भारत में बहुत साधारण शब्दों में कहें, तो ब्रेड की समझ यानी ‘ब्रेड लिटरेसी’ की कमी है। और हम उसी को बदलने की कोशिश कर रहे हैं, जिसकी शुरुआत हमने पुणे से की है। हमारा उद्देश्य है, लोगों को ब्रेड खाने के सबसे अच्छे और सबसे आसान तरीक़े बताना। इतना सरल कि उसे बस मक्खन के साथ खा लिया जाए। हम अच्छी ब्रेड के बारे में जागरूकता फैलाना चाहते हैं, सिर्फ़ पुणे ही नहीं, बल्कि उससे भी आगे। एक-एक क़दम करके।

लेकिन भारत में ब्रेड को लेकर हमारी सोच बदलने की इस कोशिश के बीच, हर गुज़रते दशक के साथ हमारी अपनी ब्रेड धीरे-धीरे उस चीज़ की तरह कम देखी जा रही, जिसमें कारीगरी शामिल होती है। आदतें बदलने के लिए इस रास्ते पर बढ़ते हुए, कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अपनी भाकरी ही खोते जा रहे हैं? हमारी परिभाषाऍं बदल रही हैं, हमारा ध्यान भी बदल रहा है। भारत की असली ब्रेड, जो हाथ से बनती है, जो स्थानीय अनाज, बाजरा, भूगोल और संस्कृति से तय होती है, वह ख़ामोशी से पृष्ठभूमि में मौजूद तो है, लेकिन अक्सर नज़रअंदाज़ कर दी जाती है।
भारत में ब्रेड की कहानी कोई नई खोज, फैशन या पश्चिमी प्रभाव की कहानी नहीं है। यह उस चीज़ को फिर से याद करने की कहानी है, जो हमारे पास हमेशा से थी, बस, उसे कहने की भाषा हम कहीं खो बैठे। यह भी अजीब बात है कि जब हम हुनर की जगह सिर्फ़ सुविधा चुनते हैं, तो अक्सर अपनी पहचान की जगह गुमनामी चुन लेते हैं। भारत की ब्रेड हमेशा से बहुत निजी और अपनापन लिए हुए रही है। उसे बारिश, मिट्टी, और उन समुदायों ने आकार दिया, जो बोते और काटते थे, और उन कारीगरों ने जो पीसते, गूँदते और बेक करते थे, ताकि अपने परिवार का पेट भर सकें। ऐसी समझ और अपनापन किसी कारखाने में बड़े पैमाने पर नहीं बनाया जा सकता। उसे सम्मान देना पड़ता है और वह पूरे ध्यान और प्यार का हक़दार है।
शायद यहीं कहीं हम राह भटक गए? जब औद्योगिक क्रांति ने हमें पैक की हुई ब्रेड दी, या जब आधुनिकता ने हमारे नाश्ते की मेज़ बदल दी, तब नहीं; बल्कि तब, जब हमने यह सुनना ही बंद कर दिया कि हमारी अपनी ब्रेड हमें क्या बताने की कोशिश कर रही थी। जैसे भाकरी तब फट जाती है, जब आटा पत्थर की चक्की में पिसा हुआ नहीं होता, जैसे कुलचे को ठीक उतनी ही फरमेंटेशन चाहिए होती है, या जैसे अप्पम को हल्की-सी खटास चाहिए होती है, तभी वह अच्छी तरह फूलता है। हमारा खाना हमेशा हमसे कई तरीक़ों से बात करता रहा है। ये हमारी तकनीकें हैं, पीढ़ियों से मिली सीख है, हमारा स्वभाव और हमारी यादें हैं, जो हमारी रोज़ की रोटी के रूप में हमारे सामने आती हैं।
इन ब्रेड को फिर से वापस लाना, कोई पुरानी यादों में खो जाने की कोशिश नहीं है, बल्कि साफ़ समझ का फ़ैसला है। यह अपने खाने को वह सम्मान वापस देने का निर्णय है, जो उसे सदा से मिलना चाहिए था। और स्वयं को यह याद दिलाने का भी कि इससे हमारी पहचान कम नहीं होती, बल्कि अधिक स्पष्ट और मज़बूत होती है। एक ऐसा देश, जो पाव और पराठा दोनों को साथ रख सकता है, शीरमाल और सॉरडो दोनों को, ब्रुन और ब्रुयोश दोनों को, इससे साफ़ दिखता है कि हमारे लिए परंपरा और तकनीक कभी एक-दूसरे के दुश्मन नहीं थे। और शायद यहीं मुझे अपने उस सवाल का जवाब मिला कि मैं आज बेकिंग क्यों करता हूँ। किसी यूरोपीय आदर्श को प्राप्त करने के लिए नहीं, न ही मात्र अतीत को रोमांटिक बनाने के लिए, बल्कि चुपचाप उसी तरह ध्यान देने के लिए, जैसा हमारा खाना हमसे चाहता है। ब्रेड हमारे लिए कभी विदेशी नहीं था, भूल जाना विदेशी था।
इसलिए अब सवाल यह नहीं है कि क्या भारत कारीगरों वाली ब्रेड को स्वीकार करेगा। असली सवाल यह है कि क्या हम अपनी ब्रेड को फिर से याद करने के लिए तैयार हैं? क्योंकि तवे, तंदूर और मिट्टी के बर्तन के बीच कहीं न कहीं भारत हमेशा ही ब्रेड से परिचित रहा है। और शायद यही हमारी सबसे सच्ची वापसी है; नए ब्रेड की ओर नहीं, बल्कि उस हुनर की ओर, जिसे हम सम्मान देना भूल गए थे।

चित्र – जय पॉंचपोर
