अनुवाद : गीत चतुर्वेदी
पिछले वर्ष, दिवाली से पहले, मुम्बई के ऐतिहासिक क्रॉफर्ड मार्केट की भीड़-भरी गलियों से गुज़रते हुए, अन्य ख़रीदारों के साथ कुहनियॉं टकराकर अपने लिए रास्ता बनाते हुए, इम्पोर्टेड चॉकलेट और रोज़मर्रा के अन्य सामानों के स्टॉलों को पार करते हुए, मैं फल-सब्ज़ी वाले हिस्से में पहुँची। वहॉं मेरी निगाह एक बहुत बड़ी, नींबू-जैसी चीज़ पर पड़ी, जोकि दुकानदार के अनुसार पोमेलो था, जिसे मेरे पति गागर नींबू कहते हैं, जोकि छठ पूजा के लिए बेहद ज़रूरी होता है।
मैंने इसे चंडीगढ़ में अपने एक पड़ोसी के घर में, सलाद की तरह खाया था। वे लोग उसे चकोतरा कहते थे। पोमेलो (सिट्रस ग्रैंडिस) को गागर नींबू, चकोतरा, बताबी लेंबू या पपनास भी कहा जाता है1 एक समय, यह आमतौर पर मिल जाता था और सलाद, अचार और चटनी में इसका इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन अब यह धीरे-धीरे ओझल होता जा रहा है। पर्सिमॉन, ड्रैगन फ्रूट, एवोकाडो जैसे फलों ने इसकी जगह ले ली है, जिन्हें लोगों की चाहत और नएपन का प्रतीक माना जाने लगा है। हालॉंकि पोमेलो का अस्तित्व केवल व्यापार पर निर्भर नहीं है।
बाज़ार जिन चीज़ों को त्याग देते हैं, रीति-रिवाज अक्सर उन चीज़ों को सहेज लेते हैं।
पूर्वी भारत में छठ पूजा ने, पोमेलो और उस जैसे कई अन्य मौसमी खाद्य पदार्थों को अपने रीति-रिवाजों के माध्यम से बचाए रखा है। छठ पूजा में न कोई पुरोहित होता है, न कोई मंदिर, और न ही कोई धर्मग्रंथ, यह पर्व एक तरह से हमारी पारिस्थितिकीय स्मृति है। भारत के अधिकांश हिस्सों में त्योहारों का चरम-बिंदु दिवाली है, वहीं बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल में छठ सिरमौर है। न पुजारी, न धर्मग्रंथ, न मंदिर; इस पर्व में पवित्रता उस भक्त के भीतर बसती है, जो भूमि की उर्वरा-शक्ति और सूर्य के प्रति नतमस्तक होकर अपनी आस्था को अभिव्यक्त करता है। मेरे पूर्वज पश्चिमी उत्तर प्रदेश से थे, सो, इस पर्व से जुड़ी तपश्चर्या को समझने में मुझे बरसों लग गए। एक बिहारी परिवार में शादी होने के कारण मैंने पटना और संथाल परगना में लंबा समय बिताया, और इस दौरान मैं इस पर्व में अर्पित की जाने वाली चीज़ों की ठेठ सादगी के महत्व को समझ पाई।

ठेकुआ, जोकि मीठा होता है और जिसका बड़ा मान है और जिसे खट्टे-तीखे आम के अचार के साथ खाया जाता है; बिहार की संस्कृति के साथ मेरा परिचय इसी ने कराया। इसे मोटे पिसे गेहूँ के आटे, घी और गुड़ से बनाया जाता है, जिसमें थोड़ी इलायची और सूखे नारियल की कतरें भी मिलाई जाती हैं। मुझे याद है, जब मैंने पहली बार, धुल कर धूप में सुखाए गेहूँ को पत्थर की आटा-चक्की पर पीसा था। उस समय घर के बड़े-बुज़ुर्ग अपनी खरखराती दानेदार आवाज़ में छठ के गीत गा रहे थे। जैसे-जैसे अन्य लोग शामिल हुए, गीत के बोल काम की लय में मानो घुल गए, श्रम और पवित्रता परस्पर समा गए। पूरे पर्व के दौरान शुद्धता पर ख़ास ज़ोर दिया जाता है। छठी मैया अपने भक्तों की मनोकामनाऍं पूरी करने वाली दयालु देवी हैं, लेकिन उनकी उपेक्षा की जाए, तो वह क्रोधित भी हो सकती हैं।
बॉंस से बने सूप में रखे गए सभी चढ़ावों में ठेकुआ ही एकमात्र ऐसा प्रसाद है, जिसे गूँदकर और तलकर बनाया जाता है। चाहे घाट हो या घर, इसकी ख़ूब मॉंग होती है। जो मित्र या परिचित पूजा में सम्मिलित नहीं हो पाते, वे भी इसकी मॉंग करते हैं। इतनी बड़ी मात्रा में इसे बनाने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पड़ती है। स्नान करने के बाद ख़ाली पेट ही इसे बनाया जाता है। आजकल, लकड़ी के सॉंचों के कारण इन पर डिज़ाइन उकेरना सरल हो गया है। पुराने ज़माने में, इसके नरम आटे को टोकरियों की बुनावट पर रखकर दबा दिया जाता था, जिससे उसकी छाप इस पर पड़ जाती थी।
हिंदू कैलेंडर के अनुसार, छठ का पर्व वर्ष में दो बार आता है। चैत्र माह में चैत्र छठ और दीपावली के छह दिन बाद मनाया जाने वाला कार्तिक छठ। इसे डाला छठ भी कहा जाता है, क्योंकि संध्या और भोर के अर्घ्य के समय सूप या डाला अर्पित किया जाता है। किसी भी अन्य धार्मिक व्रत की तरह, छठ का आरंभ चौथे दिन नहाय-खाय से होता है, जिस दिन व्रती को कुऍं या नदी के पानी में स्नान करने के बाद ही भोजन ग्रहण करने की अनुमति होती है। यह भोजन सात्विक होता है : अरवा चावल, चने की दाल और लौकी। चाहें, तो कद्दू भी खा सकते हैं। सात्विक भोजन यह सुनिश्चत करता है कि मनोकामनाऍं पूरी करने वाली प्रार्थना से पहले शरीर पूरी तरह शुद्ध हो।
पारंपरिक परिवेश में भोजन मिट्टी के चूल्हे पर पकाया जाता है। जिनके पास जलाने के लिए लकड़ी या ऑंगन की सुविधा नहीं होती, वे गैस चूल्हे का उपयोग करते हैं। भोजन करने के बाद व्रती कुछ हिस्सा दूसरों के लिए छोड़ देते हैं, जिसे प्रसाद समझ कर ग्रहण किया जाता है। ऐसा करने से व्रती का मान बढ़ता है और उसे आशीर्वाद प्राप्त होता है।
सूर्य षष्ठि पूजा से एक दिन पहले को खरना कहा जाता है। तब गुड़ डालकर चावल की खीर बनाई जाती है। व्रत के बाद रात के समय खीर के साथ चावल या गेहूँ के आटे से बनी रोटियॉं या पूरियॉं प्रसाद के रूप में खाई जाती हैं। इससे पहले केले के पत्ते पर खीर, दूध, केला, मूली, पान और सुपारी रखकर छठी माता को अर्पित किया जाता है। इसी दिन से 36 घंटे लंबे व्रत का आरंभ होता है।
अगले दिन बड़ी संख्या में ठेकुए बनाए जाते हैं। यह एक सामूहिक कार्य है, जिसमें सम्मिलित होने वाले सभी लोगों को व्रत रखना होता है। कुछ परिजन बाज़ार जाकर सूप में सजाई जाने वाली सामग्रियॉं ले आते हैं।
सूर्यास्त के समय, कमर तक पानी में खड़े होकर श्रद्धालु, सामग्रियों से भरा सूप अस्त होते सूर्य को दिखाते हैं। नदी या तालाब के किनारे गन्ने की पॉंच डंडियॉं लगाकर एक पवित्र स्थान बनाया जाता है। उस अस्थाई निर्मिति के अंदर जलते हुए दीपक रखे जाते हैं, जिन्हें सूर्य का प्रतीक माना जाता है। ट्रेसी पिंटचम के अनुसार, इस व्रत में इस्तेमाल होने वाला गन्ना, दरअसल नई फ़सल का प्रतीक है, जोकि भूमि की उर्वरता और उसके पुनर्नवा होने को दर्शाता है। यह सूर्य के प्रकाश और जल का प्रतीकात्मक मिलन है, जिससे सबके जीवन में समृद्धि आती है।

यह व्रत अगली सुबह (बिहनिया अर्घ्य) संपन्न होता है, जब व्रती लोग उगते सूर्य को जल और दूध और सूप में नई सामग्री भरकर अर्पित करते हैं। अन्य लोग भी छठी मैया को जल चढ़ाते हैं और सूर्य देव से आशीर्वाद मॉंगते हैं। व्रतियों के कठिन उपवास और सूर्य की किरणों से पवित्र हुए प्रसाद को ग्रहण करने के लिए उपस्थित लोगों में एक तरह की होड़-सी मच जाती है। रोचक बात है कि मिथिला अंचल में, चौथचंदा पूजा के समय चंद्र देव को भी इसी तरह का प्रसाद अर्पित किया जाता है।
इस व्रत के प्रति पूर्वी भारत में इतनी गहरी आस्था है कि जो लोग इसे नहीं मानते, उनका भी विश्वास है कि सूर्य का आशीर्वाद सभी पर समान रूप से बरसता है, उनके धर्म, वर्ग या जाति चाहे कुछ भी हों। मूल रूप से मधुबनी की और अब दिल्ली में बस चुकीं संजीदा हर वर्ष पूरी आस्था के साथ छठ का व्रत रखती हैं। पटना में साधारण-सा जीवन जीने वाली सीमा और उसकी मॉं दशकों से यह व्रत रखती आ रही हैं। उनके आसपास उनका समुदाय पूरी ज़िन्दादिली के साथ इसमें शामिल होता है : टोकरी बुनने वाले, चूल्हे और दीये बनाने वाले कुम्हार, सब्ज़ी बेचने वाले और न जाने कितने लोग, अपना श्रम और भेंट चढ़ाते हैं। कोई धर्मग्रंथ या मंदिर के रीति-रिवाज न होने के कारण, छठी मैया उस परंपरा का अंग हैं, जिसे मानव-विज्ञानी ‘लघु परंपरा’ कहते हैं, अर्थात एक ऐसी जीवंत आस्था, जो सामूहिक प्रथाओं, स्मृतियों और भक्ति के बल पर निरंतर टिकी रहे।
सूर्य देव और छठी मैया की स्तुति करने वाले छठ गीतों में संसार की सारी समृद्धि के लिए सूर्य के प्रकाश की महिमा का वर्णन किया जाता है। इस पर्व से गहराई से जुड़े ये गीत खेती-बाड़ी के कामों में स्त्रियों की महत्वूपर्ण भूमिका और योगदान की झलक भी दिखाते हैं। मैंने इन गीतों को पहली बार तब सुना था, जब अपनी शादी के कुछ समय बाद मैं झारखंड के पलामू ज़िले में स्थिति डाल्टनगंज में थी।
‘उठ जाओ, लोग आने वाले हैं, हमारे घर में छठ के गीत गाने के लिए।’ मेरी सासू मॉं की आवाज़ गूँजी। साड़ी को कंधे पर कसकर लपेटते हुए मैं ननदों, चाचियों और पड़ोसियों में शामिल हो गई। उनकी आवाज़ लहरों की तरह ऊपर-नीचे हो रही थी। जो शब्द मेरे कानों तक पहुँचे, वे थे- दीनानाथ, छठी मैया, दौरा और सुग्गा। इन गीतों में सूर्य देव नारियल के पेड़ों के पीछे से झॉंकते हैं, केले के पके हुए गुच्छों को तोते ललचाई निगाह से देखते हैं, स्त्रियॉं उन बाज़ारों का उल्लेख करती हैं जहॉं से फल ख़रीदे जा सकते हैं, साथ ही वे अपने बेटों, बेटियों और पूरे परिवार की समृद्धि के लिए प्रार्थना भी करती हैं।
बरसों बाद, पटना में अपने अपार्टमेंट की बाल्कनी में खड़े होकर, मैंने शारदा सिन्हा जैसी प्रसिद्ध गायिकाओं और भोजपुरी संगीत के उभरते सितारों की आवाज़ में ये गीत सुने। पीढ़ियों से ये शब्द यथावत बने हुए हैं। पूरा शहर एक शांत, सामूहिक उमंग में डूबा हुआ रहता। एक छठ गीत इस तरह है :
सातों कोठलिया जी दीनानाथ
सातों में केबर तोहरा
डूबते हो दीनानाथ दुनिया अन्हार
तोहरा उगते जी दीनानाथ दुनिया अंजोर…

यह गीत छठ पर्व के पर्यावरणीय तर्क को प्रस्तुत करता है : सूर्य के प्रकाश के बिना न भोजन संभव है, न सामाजिक नैरंतर्य। छठ की जड़ें प्रकृति-पूजन की परंपरा से जुडी हैं। महाभारत में इसका उल्लेख मिलता है, जब कर्ण को सुबह के समय सूर्य को अर्घ्य देता दिखाया गया है। इन गीतों और अर्पित की जाने वाले सामग्रियों में प्रकृति-संरक्षण और स्थानीय आजीविका की झलक मिल जाती है। ट्रॉपिकल या ऊष्ण-कटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले फलों की विविधता पर 2016 में हुए एक अध्ययन के अनुसार, कुछ फलों को घरों के बगीचों में केवल छठ पूजा के लिए ही उगाया जाता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसका सबसे अच्छा उदाहरण पोमेलो या चकोतरा है, जिसे अधिकांश परिवार केवल इसी त्योहार के लिए उगाते हैं। पोमेलो की जैव-विविधता को बिहार में बचाए रखने में इस पर्व का महत्वपूर्ण योगदान है। इससे यह भी पता चलता है कि घरों के बग़ीचे न केवल परिवार की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करते हैं, बल्कि फलों की ऐसी प्रजातियों को सुरक्षित रखकर परिवार की आमदनी में भी योगदान करते हैं।
ऊर्जा से भरपूर एक और कंद है सुथनी। यह एक प्रकार की रतालू है, जो रोऍंदार आलू जैसी दिखती है। दुनिया-भर में लगभग तीस करोड़ लोग इसका सेवन करते हैं, लेकिन स्थानीय बाज़ारों में यह छठ के आसपास मात्र कुछ दिनों के लिए ही देखने को मिलती है। एक समय, यह लोगों के नियमित भोजन का अंग हुआ करती थी, लेकिन बदलते स्वाद के साथ अब इसका चलन कम है। पिछले तीस बरसों से छठ मना रहीं श्रीमती पूनम सिन्हा बताती हैं कि सुथनी की चटनी केवल उनकी सासू मॉं खाती हैं, नई पीढ़ी को नहीं पसंद।
छठ से जुड़ाव के कारण चावल की एक स्थानीय क़िस्म का बाज़ार भी बना हुआ है, जिसे गमहरी चावल कहते हैं। यह सीतामढ़ी क्षेत्र में उगाया जाता है। छठ की धार्मिक परंपरा इस चावल की खेती को बढ़ावा देने की ख़ास प्रेरणा है, क्योंकि इसकी ऊँची क़ीमत, लगभग नौ सौ रुपए प्रति किलो तक, मिल जाती है। यह एक विशेष प्रजाति है। धार्मिक शुद्धता बनाए रखने के लिए इसे ओखली और मूसल से कूटा जाता है। इसमें कोई प्रिज़र्वेटिव नहीं मिलाया जाता। बाढ़ से प्रभावित सीतामढ़ी की भूमि आर्द्र रहती है। इस कारण वहॉं सिंघाड़ा प्रचुरता में होता है। सिंघाड़ा अनाज नहीं है। इसे धार्मिक अनुष्ठानों और व्रतों में खाया जाता है। छठ पर्व में यह सूप का एक अनिवार्य अंग होता है। यह सबसे अधिक पैदावार देने वाले जलीय पौधों में से एक है, क्योंकि इसकी जड़ें पौधे की प्रकाश-संश्लेषण की क्षमता को बढ़ा देती हैं। इस त्योहार के कारण साल-भर के लिए एक छोटी, किंतु महत्वपूर्ण मॉंग पैदा हो जाती है, जिससे सिंघाड़े की खेती के लिए आवश्यक पारिस्थितिकीय तंत्र को बनाए रखने को बढ़ावा मिलता है।
इन परंपराओं ने न केवल कई तरह के खाद्य-पदार्थों को, बल्कि आजीविका के साधनों को भी बचाए रखा है। मिथिला, जहॉं मॉनसून और उफनती नदियों से कई क्षेत्रों में बाढ़ जैसे हालात बन जाते हैं, वहॉं छठ पूजा के लिए घाटों पर खस की घास लगाने के पर्यावरणीय के साथ-साथ आर्थिक मायने भी हैं। स्त्रियॉं इसका प्रयोग सिक्की आर्ट के लिए करती हैं, जिससे उनकी रचनात्मक ऊर्जा को एक माध्यम मिलता है, साथ ही साथ परिवार की आय में मदद भी मिलती है। स्थानीय किसान खेतों की मेड़ पर इसे उगाते हैं, तो भीषण बाढ़ में फ़सलों की सुरक्षा होती है।
हिंदुओं की सामाजिक व्यवस्था में आमतौर पर हाशिए पर रहने वाले डोम समुदाय के लोगों द्वारा बनाए गए सूप और दौरी की भी इस त्योहार में काफ़ी मॉंग होती है। तेज़ी से बढ़ने की क्षमता और मज़बूती के कारण बॉंस हिंदुओं के रीति-रिवाजों में गहरा अर्थ रखता है। बॉंस की उगाई, कटाई और उपयोग छठ की पर्यावरणीय ज्ञान-परंपरा के अंग हैं। सूप पर सिंदूर लगाया जाता है। उसमें फल, अनाज और फूल रखकर अर्घ्य देने के लिए तैयार किया जाता है। छठ के एक लोकप्रिय गीत में इनके महत्व को इस प्रकार दर्शाया गया है :
बहंगोई लचकत जाई, अरघ के बेरिया हो छठी मइया,
गागर निंबुआ सुगंध बिखेरत घाटे सुहागन जाई,
सूरज देवता के अरघ देब, गोद में जल भरि लाई,
नदिया के किनारे गूँजे गीत, भक्ति रस बरसाई
सूप धोवा के तैयार भइल,
फल-फूल सजावले अंगना
नदिया के पथ पर निकली बरातिन…
सूर्य देव और छठी मइया को अर्घ्य देने के लिए शुद्धता और जल स्रोतों को विशेष महत्व दिया जाता है, जिसके कारण हर वर्ष इन स्रोतों की सफ़ाई की जाती है। पूजा के आयोजन के लिए जल स्रोतों और उनके किनारों की सफ़ाई और रख-रखाव से पर्यावरण का तंत्र स्वस्थ बना रहता है, जिससे जैव-विविधता के संरक्षण में, विशेषतौर पर आर्द्रभूमि क्षेत्रों में, महत्वपूर्ण योगदान होता है। (केसरी, 2009) नीचे दी गई पंक्तियों में छठी मइया अपने भक्तों से बात कर रही हैं कि किस तरह घाटों पर मकड़ी के जाले (मकरी बसेरा) और घास (दुबिया) उग आए हैं। वह भक्तों से उन घाटों को साफ़ करने का आग्रह करती हैं।
कोपि कोपि बोलेली छठी मइया,
सुनिए सेवक लोग, मोरा घाटे दुबिया उपज गैले,
मकरी बसेरा लिहेले, मकरी बसेरा लिहेले,
ऐ हाथ जोड़ी कहे ले सेवक,
रउर घाटे दुबिया छिलाई देबो,
मकरी उजाड़ि देबो…
हालॉंकि जिन पारिस्थितिकीय तंत्रों पर छठ निर्भर है, उन पर गहरा दबाव है। आर्द्रभूमि सिकुड़ रही है, नदियों के तट कंक्रीट से पट रहे हैं, ग्रामीण तथा शहरी दोनों ही इलाक़ों से घरेलू बग़ीचे ग़ायब हो रहे हैं। ख़तरा है कि सुथनी जल्द ही पूरी तरह ओझल हो जाए, क्योंकि स्वाद के इस दौर में, फीके और अजीब दिखने वाले इस कंद की कोई पूछ नहीं है। लोगों का स्वाद बदल रहा है, इस कारण पोमेलो और सिंघाड़े भी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।
जैसे-जैसे खान-पान की एकरूपता और जलवायु पर पड़ने वाले दबाव बढ़ रहे हैं, यह पर्व एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है : संरक्षण की ऐसी अनौपचारिक पद्धतियों का क्या होगा, जब उन्हें सहारा देने वाला परिवेश ही समाप्त हो जाएगा?

Endnotes
- Research on tropical fruit diversity in eastern India indicates that certain fruits, including pomelo (Citrus grandis), are conserved in home gardens primarily due to ritual requirements associated with Chhath Puja.
- Arnau, G., et al. (2010). Yams (Dioscorea spp.): A neglected crop with high nutritional and medicinal value.
- Nayaboga, G., et al. (2014). Dioscorea species as energy sources in tropical diets.
- Lev, E., & Shriver, A. (1998). Ethnobotanical perspectives on root and tuber crops.
- Kesari, K. (2009). Ritual ecology and water-body maintenance during Chhath Puja.
- Verma, A. B. (2019). Role of aquatic plants in the livelihood purposes in the wetlands of north Bihar. Journal of Medicinal Plants Studies, 7(1), 120–123.
- Jha, Vidyanath, A. B. Verma, Rajeev Kumar and Mani Shankar Jha. 2016. Chrysopogon zizanioides (L.) Roberty (Katara jhar) as a tool for rural development in the floodplains of Mithila, north Bihar. Journal of Traditional and Folk Practices, 4(2): 104–116.
- Singh, Harsha, and Aanchal Malhotra. “The Ridges of a Thekua Mould.” Museum of Material Memory, 2024.
https://museumofmaterialmemory.com/the-ridges-of-a-thekua-mould
