आलू पिटका
Volume 6 | Issue 2 [June 2026]

आलू पिटका
मैत्रेयी बरुआ

Volume 6 | Issue 2 [June 2026]

– अंग्रेज़ी से अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

चित्र – विजयकुमार सीथप्पा

एक समय की बात है, अनिनी में एक छोटी बच्‍ची रहती थी। फ़र्ज़ कीजिए कि उसका नाम जे था। कुछ दिनों के लिए, उसने खाना खाना बंद कर दिया। उसकी मॉं ने उसे मनाने की बहुत कोशिश की, लेकिन सब व्‍यर्थ। व‍ह बस आलू पिटका मॉंगती रही। यानी मसले हुए आलू।

उन दिनों, उसे उबले हुए आलुओं के सपने आते थे, जिन्‍हें अभी-अभी प्रेशर कुकर से बाहर निकाला गया हो, कुकर जिसने कम से कम दो बार ज़ोरदार सीटी बजाई हो।

उसकी मॉं, गरम भाप छोड़ते आलुओं से उनकी पतली परत निकाल रही थीं। छिलकों पर पड़े काले धब्‍बों की वजह से वे बड़े आलू किसी जानवर सरीखे दिख रहे थे।

आलू के स्‍टार्च की वजह से मॉं की उँगलियों में जलन का अहसास होने लगा था। वह बार-बार अपना हाथ ठंडे पानी से भरी कड़ाही में डुबोतीं। हल्‍के-सफ़ेद रंग वाले वे आलू जब थोड़े नरम हो जाते, तो मॉं अपनी मुट्ठियों से हथौड़े जैसा प्रहार करते हुए उन्‍हें मसल देतीं।

धप्‍प धप्‍प धप्‍प…

वह ऐसा इसलिए करतीं, ताकि सुनिश्‍चित कर सकें कि आलू का कोई कठोर और ज़‍िद्दी टुकड़ा यदि बचा रह गया हो, तो वह बाक़ी हिस्‍सों के साथ एकमेक हो जाए।

इसके बाद थोड़ी सजावट की बारी। मसले हुए आलुओं में एक चुटकी नमक और एक चम्‍मच सरसों का तेल डाला गया। लेकिन इसमें प्‍याज़ और मिर्च के लिए कोई जगह न होती। प्‍याज़ का स्‍वाद थोड़ा कुरकुरा और तेज़ तो होता है, लेकिन उसके कारण मुख से दुर्गंध आने लगती, जबकि मिर्च के तीखेपन के कारण ऑंख से ऑंसू आ जाते।

जब सब कुछ अच्‍छी तरह मिल गया, मसले हुए आलुओं को थपथपाकर उनके असली आकार में ला दिया गया- तब वह एक विशालकाय आलू की तरह दिखने लगा।

मन ही मन हिसाब लगाकर उसकी मॉं ने आलू की उस विशाल लोई से तीन बराबर हिस्‍से निकाले। कमरे में एक कच्‍ची-सी महक फैल गई, भूख की महक।

जे और उसकी बहनों के लिए स्‍टेनलेस स्‍टील की तीन थालियों में मक्‍खन लगे भात के साथ आलू पिटका परोसा गया। ए, एम और जे- तीन बहनें थीं, एक के बाद एक पैदा हुईं, और वे लकड़ी की मेज़ पर बैठकर खाना खाती थीं। बैठते समय जब वे अपनी कुर्स‍ियॉं उस मेज़ के पास खींचतीं, मेज़ के पाए हिलते लगते थे।

उन तीनों में जे सबसे शांत थी। पहला कौर लेने से पहले उसने मसले हुए आलू में अपनी तर्जनी धँसाई, और उसके बीचोंबीच एक गड्ढा बना दिया।

किसी ने कभी जे से यह नहीं पूछा कि उसे आलू पिटका इतना क्‍यों पसंद था। न ही उसने कभी किसी को यह बताने का प्रयास किया कि आलू पिटका में गड्ढा बनाने के बाद वह उसमें क्‍या देखती थी।

जब घर की मुर्ग‍ियॉं अंडे देती थीं, खाने के साथ उबले हुए अंडे भी होते थे।

दूसरी मॉंऍं अपने बच्‍चों के लिए पूरी, पराठे या चीनी-तेल में डूबा हुआ सूजी का हलवा बनाती थीं। स्‍कूल जाने से पहले ए, एम और जे, रोज़ वही आलू पिटका-भात खाती थीं। रोज़-रोज़ वही खाने से उन्‍हें एक तरह का सुकून मिलता था। भोजन अच्‍छा था, और जीवन भी।

अनिनी इतना अंदरूनी इलाक़ा था कि वहॉं के लोगों के नाश्‍ते में कभी ब्रेड या डोसा खाने का सुख नहीं मिला। हिमालय के इस छोटे-से क़स्‍बे में न तो कोई किराने की दुकान थी और न ही खाने-पीने की कोई जगह। बस, कोऑपरेटिव सोसायटी का एक स्‍टोर था। लकड़ी से बने उसके ताखों में चावल, दाल, डालडा, आटा, मूँगफली, बिस्‍कुट और पापड़ रखे होते थे। वहॉं बेशुमार चूहे भी रहते थे। कुछ तो बिल्लियों जितने बड़े थे। रात में जब सेल्‍समैन दुकान बंद करके चले जाते, चूहे एकदम सक्रिय हो जाते थे। दुकान में अमोनिया जैसी एक बू बराबर बनी रहती थी।

दुर्गा पूजा और बिहू के दौरान स्‍टोर की छत से बच्‍चों के कपड़े लटका दिए जाते थे। ज़्यादातर कपड़े अनबिके रह जाते और तब तक नहीं हटाए जाते थे, जब तक कि लटके-लटके उनकी चमक ख़त्‍म न हो जाए और उन पर धूल की परत न जम जाए। जिन्‍हें ब्रेड, जैम या नूडल्‍स खाने का मन होता, वे पास स्थित डिब्रूगढ़ और रोइंग से ले आते। अनिनी के उलट, डिब्रूगढ़ और रोइंग काफ़ी विकसित थे। वहॉं अच्‍छी सड़कें थीं, हर तरह की दुकानें थीं, सिनेमा हॉल थे, कारों के शो-रूम थे और प्राइवेट स्‍कूल भी थे।

जब हालात कठिन हो गए थे, तब अनिनी के लोग सोचते थे कि वे एक दिन डिब्रूगढ़ या रोइंग चले जाऍंगे। उनके चारों ओर बर्फ़ से ढँकी पहाड़ी चोटियॉं थीं, जिनकी वजह से बने अकेलेपन से वे बाहर निकलना चाहते थे। यह वैसा ही सपना था, जैसे छोटे शहरों के लोग दिल्‍ली या मुंबई चले जाना चाहते हों। इन बड़े शहरों से लोग विदेश चले जाते थे। लेकिन अनिनी जस का तस बना रहा, जैसे ए, एम और जे का नाश्‍ता।

अनिनी बाहर की दुनिया से जुड़ सके, इसका ज़रिया था हैलीकॉप्‍टर। उसका आना मौसम पर निर्भर करता था। अनिनी में अक्‍सर बार‍िश होती थी। जब नहीं होती थी, तब भी बमुश्किल हज़ार लोगों की आबादी वाले अनिनी को बादल, किसी कंबल की तरह ढँक लेते थे।

हैलीकॉप्‍टर का आना सदैव किसी उत्‍सव की तरह मनाया जाता, लेकिन ऐसे दिन दुर्लभ ही होते थे। जब हैलीकॉप्‍टर की गगनभेदी आवाज़ अन‍िनी में गूँजती थी, लोग अपने घरों से बाहर निकल आते थे। ऐसा बवंडर उठता, जो सबको अपनी ओर खींच लेता था और हैलीकॉप्‍टर के पंखे लंबी प्रतीक्षा का बोझ हटाते हुए घूमते रहते थे।

फिर, एक-एक करके, स्त्रियॉं, बच्‍चे, मज़दूर और दफ़्तर जाने वाले लोग, अपना काम बीच में छोड़कर हैलीपैड की ओर चल पड़ते थे। एक छोटी पहाड़ी पर बने हैलीपैड से यह दृश्‍य बिलकुल ‘द पाइड पाइपर ऑफ़ हैमलिन’ जैसा लगता था। हैलीकॉप्‍टर ज़रूरत की तमाम चीज़ें ले आता था, लोग, खाना, कपड़े, किताबें। कभी-कभी प्‍यार और स्‍मृतियॉं भी।

एक बार सर्दियों में हैलीकॉप्‍टर कई सप्‍ताह तक नहीं आ पाया। खाने-पीने की तमाम चीज़ों का भंडार कम पड़ने लगा। किचन गार्डन ख़ाली और वीरान लगने लगे। मक्‍के के पौधों की पत्तियॉं झुर्रीदार और बेजान हो गई थीं। सूखे हुए-से वे उदास खड़े थे। जैसे, बर्फ़ीली हवाओं के थपेड़ों के बीच कराह रहे हों। बर्फ़ से ढँकी सड़कें, खेत और छतें, ज्‍यों ग़ुस्‍से और निराशा से फुफकार रही थीं। पहाड़ ध्‍यान में लीन ऋषियों की तरह शांत खड़े थे और हैलीकॉप्‍टर के जल्‍दी आने की लोगों की प्रार्थनाओं में शामिल थे।

हर घर में आलू, कद्दू, स्‍क्‍वैश, मक्‍का और लाईपत्‍ता उगाया जाता था। जे की मॉं ख़ूब मेहनती थीं और मूँगफली भी उगाती थीं। लेकिन वहॉं की कड़ाके की ठंड से कुछ भी बच नहीं पाता था। यहॉं तक कि मुर्गियॉं, बत्‍तखें, बकरियॉं और पालतू कुत्‍ता विंट्री भी सुस्‍त पड़ जाता था। ये सब जे के ‘एनिमल फार्म’ के हिस्‍से थे। घर के कोने में बना मछलियों का तालाब मछलियों के मरने से पहले ही कीचड़ में तब्‍दील हो चुका था।

रसोई में से सबसे पहले आलू विलुप्‍त हुए, क्‍योंकि लगभग हर व्‍यंजन में आलू का प्रयोग होता था। कभी-कभी, स्‍थानीय मिशमी स्त्रियॉं पहाड़ के ख़तरनाक रास्‍तों से उतरकर अनिनी आती थीं। वे कुछ समय तक आलू की आपूर्ति बनाए रखती थीं। उन बूढ़ी स्त्रियों के सिर पर बॉंस से बनी टोकरियॉं होतीं, जिनमें उनके गाँवों में उगी सब्‍ज़ियॉं रखी होती थीं। वे अनिनी में घर-घर जातीं और चावल, चीनी, चायपत्‍ती के बदले अपनी सब्‍ज़ियॉं बेचतीं।

आलू के मामले में जे की मॉं ने समझदारी से काम लेना शुरू किया। उन्‍हें पूर्वाभास था कि कुछ होने वाला है। जे के पिता किसी कार्यवश हफ़्तों से घर से दूर, एक दौरे पर थे। जे के दिमाग़ में दो ‘पी’ घूमते रहते थे- पापा और पोटैटो (आलू)।

कठिन दिनों में, उसकी मॉं रोज़ सिर्फ़ एक आलू पकाती थीं। वह जे के आलू पिटका के लिए होता। मॉं ने चिकन करी और घुघनी में आलू डालना बंद कर दिया था। खाना बेस्‍वाद लगने लगा था।

जब आलू पूरी तरह ख़त्‍म हो गए, जे ने भूख हड़ताल कर दी। यह मौन प्रतिरोध था। उसने दो दिन तक कुछ नहीं खाया। मॉं गहरी चिंता में पड़ गईं। वह पड़ोसियों से पूछतीं कि क्‍या उनके पास थोड़ा आलू बचा है। जवाब हमेशा न में मिलता था।

भूख हड़ताल के तीसरे दिन चक्रवती सर, जोकि जे को अंग्रेज़ी और गणित पढ़ाते थे, अपने दाहिने कंधे पर कपड़े का थैला लटकाए उसके घर आए। कई किलोमीटर पैदल चलकर वह एक गॉंव से आलू ख़रीद लाए थे।

दोपहर के खाने के लिए जे की मॉं ने आलू उबाले। लड़कियों ने चावल और दाल के साथ आलू पिटका खाया। जे ने मुस्‍कराते हुए अपनी मॉं को देखा। उसकी मॉं खिड़की से बाहर देख रही थीं। बाहर धूप खिली हुई थी और वह पास आते हैलीकॉप्‍टर की आवाज़ सुनने की कोशिश कर रही थीं।

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