बांग्ला से अनुवाद अमृता बेरा
लोगों की ज़िंदगी और गुज़र-बसर के क़िस्से असल में इतने विविध हैं कि जिन्हें हम परियों की कहानियाँ मानकर रोमांचक समझते हैं, ये उनसे रत्ती भर भी कम नहीं!
ऊपरी तौर पर देखने में लगता है कि हमारी इस गतिशील सभ्यता के भीतर, हर दिन बस एक ही ढर्रे पर चल रहा है, जबकि जो लोग मानवीय इतिहास की नब्ज़ समझते हैं, उन्हें पता है कि यह जीवन कितना अनूठा है। इसमें हर पल नए मोड़ और अनगिनत बदलाव छिपे हैं। इन बदलती कहानियों में अब सिर्फ़ जज़्बात ही नहीं, बल्कि घर, छाते, कपड़े से लेकर पूरा का पूरा रसोईघर भी एक जीवंत पात्र की तरह शामिल हो चुका है। ये रसोई के जाने-पहचाने बर्तन — हाँडी, पतीले और करछुल , अब अपने तय दायरे से बाहर निकलकर मानवीय विस्थापन और पलायन को एक नया ठिकाना दे रहे हैं। इन्हें महज़ ‘घर-गृहस्थी की बातें’ कहकर दरकिनार करना उचित नहीं होगा। सच तो यह है कि अगर हम ज़रा गहराई में उतरकर देखें, तो समझ पाते हैं कि हज़ारों राजनीतिक बहसें और विचारधाराएँ इन्हीं रसोईघरों के चूल्हों और बर्तनों के बीच से जन्म लेती हैं।
मानव-प्रवास के अध्येता निरंतर एक ऐसी सांस्कृतिक यात्रा की तलाश में रहते हैं, जो सिर्फ़ इतिहास और भूगोल की सीमाओं तक सीमित न हो। काल और स्थान के साथ इन यात्राओं का स्वरूप बदलता रहा है, और इन्हीं रास्तों पर चलते हुए न जाने कितनी ही अनूठी खान-पान की संस्कृतियाँ विकसित हुईं हैं। आज अगर हम पीछे मुड़कर देखें, तो मानव सभ्यता की ये यात्राएं किसी जादुई कहानी या परियों की कथाओं जैसे अविश्वसनीय जान पड़ते हैं।
आज भी मकर संक्रांति के अवसर पर घरों में पीठे (चावल के आटे से बने मीठे पकवान) बनाए जाते हैं। क्या यह स्वाद हमें उन ‘पुरोडाश’ की याद दिलाता है, जिन्हें वैदिक काल में आर्य देवताओं को यज्ञ की आहुति के रूप में समर्पित करते थे? शायद नहीं। समय की धारा में उस पुरोडाश का स्वरूप इतना बदल चुका है कि इस तेज़ रफ़्तार सभ्यता के शोर में उसकी पुरानी पहचान को ढूंढ पाना मुमकिन नहीं।
सोलहवीं सदी के अंत में ‘ आईन-ए-अकबरी’ नाम की किताब लिखी गई थी। उस ग्रंथ में उत्तर भारतीय रसोई के तौर-तरीक़ों और पकवानों की विधियों का भी विवरण दर्ज था। हम ग़ौर करें तो देखेंगे कि उसमें कहीं भी मिर्च का कोई उल्लेख नहीं है। जबकि, दक्षिण भारत में मिर्च उससे पहले ही पहुँच चुका था। सिर्फ़ मिर्च ही क्यों, लोगों के सफ़र के रास्तों के साथ न जाने कितनी ही और मसालों की कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इन रास्तों पर रक्तपात, मार-काट और समझौते निश्चित थे। उन इतिहासों को पार कर आने पर देखें, तो समझ आता है कि मनुष्य की यह गतिशीलता और उसका यह निरंतर सफ़र आज भी थमा नहीं है—वह अब भी जारी है।
पृथ्वी पर मनुष्य का विस्थापन एक शाश्वत सत्य है—एक ऐसी प्रक्रिया जो जितनी पुरानी है, उतनी ही प्रासंगिक। निरंतरता के साथ चलती आ रही इस समस्या की छाया, देश और काल को छूते हुए समय-समय पर बंगाल के घरों पर भी पड़ी, और लोगों का हाथ पकड़ आगे बढ़ती रही। अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए कभी यह अंडमान तो कभी त्रिपुरा की सीमाओं को पार करती हुई पंजाब की गलियों तक फैल गई। सच तो यह है कि यह फैलाव थमा नहीं है, आज भी जारी है। इतिहास के इस गतिशील स्वरूप को जानने-समझने की जिज्ञासा भला किसे नहीं होगी! लंदन के ब्रिक लेन में बसी बंगाली बस्ती की तरह ही, अपने घर-परिवार, नून-तेल-लकड़ी जैसी बुनियादी ज़रूरतों के लिए संघर्ष करते इन लोगों की कहानियाँ आज भी उतनी ही रोमांचक हैं।
भोजन और खान-पान की संस्कृति, यानी पाक-कला के नृविज्ञान को अपने तरीक़े से समझने की एक गहरी बेचैनी मुझमें और मेरे पति अमित सेन में जाग उठी। इसी छटपटाहट ने हमें अगरतला के गाँवों से लेकर मिडिल अंडमान की ‘बंबू टेकरी’ तक का सफ़र तय कराया। रंगून की गलियों से गुज़रते हुए, वहाँ के काली मंदिर से मछली बाज़ार तक का नज़ारा किसी जीवंत चित्रशाला जैसा लगता था। वहाँ के लोगों का जीवन और उनकी रसोइयाँ, किसी उपन्यास के हिस्से-सा, अद्भुत था। आइए, हम उसी कहानी का हिस्सा बनते हैं।

आज का बंगाल हमेशा से ऐसा नहीं था। मानचित्रों पर इंसानों की कहानियाँ दर्ज नहीं होतीं; उन्हें तो लोगों के बीच, उनके उस बिखरे हुए संसार में खोजना पड़ता है, जहाँ तक पहुँचना भी कोई सहज काम नहीं। इन्हीं सवालों में उलझे, हम प्रवासी बंगालियों के खान-पान की एक नृवंशवैज्ञानिक (ऐन्थ्रॉपोलॉजिकल) व्याख्या तलाशने निकले। आप इसे मेरी सनक कह सकते हैं, पर अतीत में आकार लेने वाले एक व्यापक समुदाय की इसी खोज ने धीरे-धीरे हमारी ज़िंदगी को एक ख़ानाबदोश का रूप दे दिया है।
हम असल में किस बंगाली को ढूंढ रहे हैं? वह, जो अपनी मर्ज़ी से अपने जड़ों को छोड़ आया, या वह जिसे हालात ने बेदख़ल कर दिया। ज़ाहिर है, इस भौगोलिक बदलाव ने उसकी पहचान और उसके वजूद को पूरी तरह बदल दिया होगा। इस विस्थापन का सीधा असर उसकी रसोई पर भी पड़ा। हमारी यह तलाश उसी ‘डायस्पोरिक बंगाली फ़ूड’ के इर्द-गिर्द बुनी गई है। इसी सिलसिले में हमने अलग-अलग जगहों की यात्राएं कीं। एक ऐसी निरंतर यात्रा जो हर पल हमें किसी नए रास्ते पर ले जाती है। हो सकता है कि आपको यह सब एक कहानी लगे, लेकिन यह एक जीती-जागती हक़ीकत है। तो चलिए, फ़िलहाल हम इस कहानी की थोड़ी आँच सेंक लें।
यहाँ, इस संदर्भ में देश के विभाजन की बात आना स्वाभाविक है। उस दौर में सियालदह स्टेशन बेघर लोगों की भीड़ से अटा रहता था। एक ऐसा दृश्य जो हमारी आँखों के सामने अक्सर तैर जाता है। उस भीड़ का हिस्सा बनकर, सरकारी काग़ज़ों में अपना नाम दर्ज कराने के बाद ही उन्हें ‘शरणार्थी’ की आधिकारिक पहचान मिलती थी। इसके बाद, इन लोगों को अलग-अलग समूहों में बांटकर विभिन्न कैंपों में भेज दिया जाता था, जहाँ से उनकी अगली मंज़िल कोई रिफ़्यूजी कॉलोनी होती थी। दीपांजन रायचौधुरी ने अपनी किताब ‘प्रवास जीवनेर कथा’ (खंड 1 और 2) में विजयगढ़ और आज़ादगढ़ जैसी कॉलोनियों के बसने के शुरुआती दिनों का वर्णन बड़े जतन से किया है। इन नई कॉलोनियों का जीवन दरअसल एक तरह का निर्वासन ही था। जिन्होंने बिजन भट्टाचार्य को पढ़ा है, वे जानते हैं कि जलप्रधान देश के लोगों पर क्या गुज़री होगी, जिन्हें अब एक नल के सामने लाइन में लगकर पानी भरना था! राशन के चावलों से ऐसी अजीब, अकबकी गंध आती थी कि जी मिचलाने लगे। लोग कहते कि यह दूसरे विश्व युद्ध के वक़्त के चावल थे, जो गोदामों में सड़ रहे थे। ऐसी कहानियाँ मुंह-ज़ुबानी ज़िंदा रहती हैं। वहाँ का माहौल किसी तिलिस्मी जादुई यथार्थवाद में रहने जैसा था। इन बस्तियों के क़िस्से आज भी मार्खेज़ की ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सॉलिट्यूड-अकेलेपन के सौ साल’ की याद दिला देते हैं।
बहरहाल, देखा जाए तो जादवपुर और लायलका मैदान की कहानियाँ क़रीब-क़रीब एक जैसी थीं, पर उनका क्या जो कुछ दिन कैंप में गुज़ारकर जहाज़ पर सवार हो गए! जो ‘कालापानी’ पार करने वाले थे! उनकी दास्तानें बिलकुल अलग थीं। इस पुनर्वास परियोजना के तहत जिन्हें अंडमान के दूरदराज़ द्वीपों पर भेजा गया, वे मुख्य रूप से दक्षिण बंगाल के ‘नमःशूद्र’ समुदाय के लोग थे। ये किसान और मछुआरे थे, जिनकी शारीरिक बनावट और मज़बूती की बाक़ायदा जांच की गई थी। इसके पीछे असल मक़सद यह परखना था कि क्या वे दुर्गम द्वीपों की कठोर परिस्थितियों में जीवित रहने और वहां टिकने के क़ाबिल हैं या नहीं। खारे समंदर को पार कर वे लोग पोर्ट ब्लेयर के वर्दीगोदाम पहुँचे, जहाँ से वे एक बार फिर इधर-उधर बिखर गए। कोई कदमतला चला गया, तो कोई डिगलीपुर में जा बसा। कदमतला के बुज़ुर्ग आज भी उन बीते दिनों को याद करते हैं, और यही दास्ताँ डिगलीपुर गए लोगों की भी है। आख़िर उन यादों को कौन भूल सकता है!
जहाज़ से उतरने के बाद, हर परिवार को पत्तों के छप्पर वाली झोपड़ियाँ दी गईं। वहाँ गर्मागर्म चावल और हिरण के मांस का झोल (शोरबा) बना, क्योंकि उन द्वीपों पर भला बकरे या मुर्ग़े कहाँ मिलते! जंगली आम और केलों के अलावा वहाँ और न जाने कितने फलों की भरमार थी। वहाँ पाट (जूट) के पत्तों जैसा दिखने वाला एक पौधा भी था, जिसे किसी ‘गायेन सर’ की माँ अक्सर पकाकर खिलाया करती थीं। शरणार्थियों के आने से कुछ समय पहले राँची (वर्तमान झारखंड) से आए प्रवासियों ने इस पौधे का नाम ‘बकरी पत्ता’ रखा दिया था। लोग कीचड़ में उतरकर ‘लैटा’ और ‘कोई’ मछली पकड़ते थे और बेंत की कोपलें पकाकर खाते थे। सरकार ने धान के बीज तो मुहैया करा दिए, पर हल-बैल नहीं दिए। वह ज़मीन बरसों से अछूती थी, जिस पर पत्तों और सड़ी-गली वनस्पतियों की मोटी परतें जमी हुई थी। लोगों ने बस मुट्ठियाँ भर-भरकर वहाँ बीज छिड़क दिए थे – खेती का यह तरीक़ा बेहद आदिम था। भोला-बरिशाल समेत पूरे दक्षिण बंगाल के वे लोग, जो इलिश(हिलसा)मछली खाकर पले-बढ़े थे, उन्हें फिर कभी अपनी मिट्टी जैसी हिलसा खानी नसीब नहीं हुई। क्योंकि समंदर की हिलसा उसके सामने बहुत बेस्वाद थी।
फिर भी, वहाँ मछली और अरबी मिलती थी। सरकारी भत्ता (डोल) बंद होने के बाद, पुनर्वासित लोगों के पास यही आख़िरी पूँजी बची थी। लेकिन क्या उस भौगोलिक क्षेत्र और उन टापुओं पर सिर्फ़ ये बंगाली शरणार्थी ही बसे थे? देखा जाए तो ब्रिटिश भारत के दौरान, 1922-23 में भी यहाँ लोगों की आवाजाही लगातार बनी हुई थी। बर्मा की करेन जनजाति के लोगों को भी गृहयुद्ध के बीच, पुनर्वास का सपना दिखा कर यहाँ लाया गया था। मायाबंदर के पास, गर्जन पेड़ों की घनी छाया में उन्होंने अपना बसेरा बनाया। क्या संसाधनों और ज़मीन को लेकर जारवाओं के साथ उनका टकराव नहीं हुआ? हुआ, वह तो होना ही था। उसी दौर में राँची के लोग भी वहाँ पहुँचे। करेन और राँची के ये लोग जंगल साफ़ करने में माहिर थे। आख़िरकार, जंगल काटकर शरणार्थियों के लिए पत्तों के छप्पर वाली झोपड़ियाँ बनाने के लिए मेहनतकश लोगों की ज़रूरत थी। साथ ही, वहाँ सेलुलर जेल के सज़ायाफ़्ता क़ैदी भी मौजूद थे। इन अलग-अलग संस्कृतियों और समुदायों के मेल ने अंडमान के जनजीवन और रसोई में दिन-रात एक अनूठे और साझा स्वाद की कहानी बुननी शुरू कर दी।
बरिशाल के वो लोग जो अपने पीछे छूटे वतन को कभी दोबारा देख नहीं पाए, अंडमान से बाहर जाना तो दूर की बात है, उनके खान-पान में ‘फ़्यूज़न’ को ढूँढ़ना बेमानी है; बल्कि वे आपको ज़िंदाबली और गिरिपुष्प जैसे उन अनजाने ‘घेरा-फूलों’ को पकाने का तरीक़ा बता सकते हैं, जिनका नाम तक आपने न सुना होगा।जिन घेरा-फूलों के पौधों से वे अपने आँगन की बाड़ बनाते थे या बिच्छू के काटने पर उसके पत्ते का रस घाव पर लगाते थे, क्या उन्हीं फूलों के पकौड़े भी बन सकते हैं? वहाँ के लोगों ने इन तमाम चीज़ों के साथ प्रयोग किए, उन्हें चखकर देखा। ये सारे अनुभव किसी आदिम पाठशाला के पाठ जैसे थे। इन्हीं अनुभवों से सीखते-सीखते, आज अंडमान की बंगाली रसोई से जब ‘तारिणी मछली’ के खट्टे सुरुआ (शोरबे) की ख़ुशबू उठती है तो वह पास की तमिल मछुआरों की बस्ती तक जा पहुँचती है। इस तरह ये रसोइयाँ आज भी एक निरंतर प्रवाहित जीवन और विस्थापन के संघर्ष की गवाह बनी हुई हैं।

अंडमान की कहानी अपनी जगह है, लेकिन त्रिपुरा का अनुभव उससे बिल्कुल अलग था। आख़िर, वह उसकी हूबहू नकल तो हो नहीं सकता था! त्रिपुरा पहुँचने वाले मुख्य रूप से कुमिल्ला और ब्राह्मणबेड़िया से थे, जो मूलतः व्यापारी समुदाय से थे। अपनी आर्थिक संपन्नता के कारण वे ज़मीन ख़रीदने में सक्षम थे। वहाँ के मूल निवासियों के बीच उनका प्रभाव इतना बढ़ा कि धीरे-धीरे वहाँ बंगाली सरकार बन गई। आज भी अगरतला के रसोईघरों में त्रिपुरी व्यंजनों का स्वाद पूरी सहजता से घुली-मिली नज़र आती है। चौमुहनी बाज़ार ‘शिदोल’ (फ़रमेंटेड मछली)के महक से भर जाता है। ‘गोदक’ (चावल, बाँस के कोपलों और केले के फूल आदि से बना एक पारंपरिक व्यंजन)अब हर बंगाली घरों में पकने लगा है। आपको लग सकता है कि झूम खेती करने वाले समुदायों के ‘टोंग घरों’ (ऊँचे मचाननुमा घर) की ख़ुशबू कैसे बंगाली बस्तियों का हिस्सा बन गई है! यह वाक़ई अद्भुत है। दरअसल, हमारी रसोई ही वह धुरी है, जो इन कहानियों की चरखी को दिन-रात घुमाता रहता है।
त्रिपुरी घरों में पूँटी और शिदोल मछली से बनने वाला ‘गोदक’ क्या कभी शाकाहारी हो सकता है? जिस व्यंजन की पहचान ही इन मछलियों से हो, उस व्यंजन का शाकाहारी रूप खोज निकाला कुमिल्ला की मौसी ने। इस तरह वक़्त के साथ व्यंजन बदल जाते हैं, या कहें – वे नया जीवन पाते हैं या खो जाते हैं। अगर आपको यह सब मनगढ़ंत बातें लगें, तो हक़ीकत जानने के लिए बारासात की बर्मा कॉलोनी में जाया जा सकता है। वहाँ आज भी रोज़ाना ठेलों पर ‘मोहिंगा’ (चावल के नूडल्स और मछली से बना सूप, जो आमतौर पर नाश्ते में खाया जाता है) बिकता मिल जाएगा। या फिर आप किसी दिन सुभाषग्राम की बर्मा कॉलोनी जा सकते हैं। प्लॉट आबंटन व्यवस्था के तहत बसे इस इलाक़े के हर घर की अलमारियों पर आज भी उस दौर की स्पष्ट छाप दिखती है, जब ये लोग बर्मा में रहा करते थे। लाख के उल्लू, ‘ओह्न नो खाओ स्वे’ (बर्मी नूडल सूप, खाने के चीनी मिट्टी के कटोरे, और न जाने क्या-क्या! ये मोहल्ले आज भी रंगून में गुज़रे अपने बचपन की यादों में डूबे रहते हैं।
पर उन लोगों का क्या जो वहाँ रंगून शहर से चिपके रह गए? पुनर्वासन के वादों के बाद भी वापस नहीं लौटे? उन रसोईघरों के मालिक आज भी जम कर मोल-भाव कर इरावती की हिल्सा मछली ख़रीदते हैं। उसमें अदरक का रस, फ़िश सॉस और मूँगफली के आटा मिलाकर जब ‘नाथालोंग पोंग’ पकाते हैं और लेमन ग्रास की ख़ुशबू फैलती है, तो बंगाल की स्मृतियाँ धीरे-धीरे धुंधली पड़ने लगती हैं। शायद चाय की पत्तियों के सलाद के साथ भात खाते हुए वे ‘बंगाली बाबू’ अपनी रसोई को एक नए अंदाज़ में ढाल रहे हैं।
यह बदलाव सिर्फ़ रंगून तक सीमित नहीं है। टौंगी से लेकर मांडले तक, बंगाली और बर्मी खान-पान यह मेल तो बस एक हिस्सा है; असल में हमें तमिल, बिहारी और राजस्थानी ज़ायक़ों के इस तालमेल को ब्रिटिश भारत के पुराने नक़्शे के परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। आज, सुबह-सुबह गर्म भात के साथ मिर्च रगड़कर समोसे खाते उस बर्मी लड़के को भोजन का यह साझा इतिहास समझाना बेमानी है। प्रवास की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि वह इंसानों के खान-पान और ज़ायक़ों को एक-दूसरे से कुछ इस तरह मिला देता है कि भूख ही मानवता का असली चेहरा बन जाती है। यही भूख शहज़ादपुर (वर्तमान बांग्लादेश में) की भूखी-प्यासी बंगाली माँ को दूर अमृतसर ले जाती है। क्योंकि सरहद के कंटीले तारों के इस पार और उस पार, यह ख़बर फैल जाती है कि वहाँ खाना उपलब्ध है। भात न सही, लंगर की रोटी, दाल और हलवा तो है। वह केवल खाना नहीं, बल्कि ईश्वर का प्रसाद है। कहते हैं कि अमृतसर शहर में कोई इंसान भूखा नहीं मरता। इसी उम्मीद में लोगों का एक हुजूम वहाँ जा पहुँचता है। न वे वहाँ की भाषा जानते हैं, न सड़कें-गलियाँ पहचानते हैं, फिर भी झुग्गियाँ किराये पर लेकर वे वहीं बस जाते हैं और अपनी ज़िंदगी गुज़ार देते हैं। उन्हें वहाँ का ‘आतप’ (अरवा) चावल बेस्वाद लगता है, क्योंकि उन्हें तो अपने ‘उबले हुए’ चावल खाने की आदत है। सुनने में यह एक मामूली-सी विलासिता लगती है, पर उनके लिए यह अपनी जड़ों से जुड़े रहने जैसा है। आख़िरकार, इंसान का मन और उसकी जीभ अक्सर अपने जाने-पहचाने स्वादों की ओर ही खिंचे चले जाते हैं। वही ‘माछ-भात’ का पुराना मोह। लेकिन, सिर्फ़ चाहने भर से तो सब हासिल नहीं हो जाता है। बंगाली कॉलोनी में मछली बाज़ार लगना शुरू हो जाता है, लेकिन यह बाज़ार कुछ अलग है। होटलों में जहाँ ‘शोल’ मछली का सिर्फ़ शरीर बिकता है, वहीं गेट हकीमा की बंगाली बस्ती में उसका सिर हाथों-हाथ बिकता है।
अगर आप स्थानिय बाज़ारों में कुछ विशेष क्षेत्र के चेहरों को खोजना चाहते हैं – तो ऐसे बाज़ारों में ज़रूर जाना चाहिए। तभी तो शोल मछली के सिर की पातुरी से लेकर पुदीना के पत्तों का झोल इन रसोईघरों में अपनी जगह बना लेते हैं। जब हिमाचल प्रदेश में सेब की फसल सस्ती होती है, तो अमृतसर की सड़कों पर सेब बहुत सस्ते दामों में बिकते हैं। उस समय शाखा-पोला (शंख और मूंगे की चूड़ियाँ ) पहने बंगाली महिलाओं के हाथ उन पके सेबों की चटनी बनाने लगते हैं। उनकी कलाईयों के शाखा-पोला खनक उठते हैं। यह ठीक चटनी तो नहीं, बल्कि इमली के साथ बनाया खट्टे-मीठे मुरब्बे जैसा होता है — ठीक वैसा ही, जैसा वे अपने देश में गर्मियों के दिनों में खाया करते थे! साग-सब्ज़ियों और मछली के साथ।
शहरों में जिन्हें हम ‘कबाड़ीवाला’ कहते हैं, उनके जीवन के उत्साह, जीने की ललक और उनकी रसोइयों की झलक देखकर हैरानी होती है। कोई पूर्वी बंगाल से है, कोई नवद्वीप से, तो कोई हुगली ज़िले के गाँवों से यहाँ पहुँचा है – इस मिले-जुले शोर और उल्लास में, रामनवमी के कल्लोल में यह निश्चित है कि आप बाख्तीन की बहुस्वरता को पाएंगे। इसका कोई पुख़्ता स्रोत तो नहीं है, पर कहा जाता है कि ब्रिटिश भारत में पटियाला के महाराजा के बुलावे पर, शहर की सफ़ाई के लिए क़रीब सौ बंगाली परिवारों को अमृतसर लाया गया था। जिन्हें आज हम ‘कबाड़ीवाला’ कहते हैं, वह सौ साल पुराना समुदाय भले ही अब बिखर चुका हो, लेकिन अमृतसर में प्रवासी बंगालियों के बसने का मानचित्र इसी कॉलोनी के इर्द-गिर्द तैयार हुआ। श्रम से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य के संघर्षों के बीच उनमें एक राष्ट्रीय पहचान की छटपटाहट भी दिखी। इस बंगाली समुदाय ने अपनी खान-पान की आदतों की जड़ों को सहेजते हुए, पंजाबी ज़ायक़े को भी बड़ी सहजता से अपनी जीवनशैली में ढाल लिया।

किसने सोचा था कि मनुष्यों का यह विस्थापन, रसोईघर को एक बिल्कुल ही नया आयाम दे देगा! मैं जितना ज़्यादा देखती हूँ, उतना ही अधिक महसूस करती हूँ कि मानवविज्ञान को समझने में रसोई की एक अनिवार्य भूमिका है। वजह जो भी रही हो, इस प्रवास ने बंगाली पहचान को एक नए ‘स्वाद-भूगोल’ से जोड़ दिया है। नतीजतन, उनकी जीवनशैली में ज़ायक़े के नए रंग घुल रहे हैं – फिर चाहे वो शादियों का खाना हो या अन्नप्राशन(बच्चे को पहली बार अन्न खिलाने की रस्म)के पकवान, यह बदलाव हर जगह साफ़ दिखाई देता है। शाकाहारी रसोई की दाल मखनी में जहाँ पिसा हुआ ज़ीरा पड़ता है, वहीं तड़के के लिए साबुत ज़ीरे का इस्तेमाल होता है। इन बंगाली मोहल्लों की दिन-रात यही कोशिश रहती है कि वे इस नई दुनिया के विविध स्वादों को पूरी तरह आत्मसात कर सकें। अब राजनीतिक निष्ठाओं से परे, यहाँ की सामूहिक आवाज़ सिर्फ़ विकास चाहती है – अगली पीढ़ी का विकास, और एक मुकम्मल विकास ही अब उनका असल लक्ष्य है। सुना है कि ब्रिटिश भारत के दौर में कुछ बंगालियों के एक समूह को सफ़ाई कर्मचारी के तौर पर पंजाब लाया गया था! आज वह बंगाली टोला लोगों की भीड़भाड़ में इस तरह खो गया है कि उसे ढूंढ पाना नामुमकिन है। लेकिन इसके बदले हमने जो खोज निकाला, वह भी कुछ कम नहीं! आज यहाँ के बाज़ारों में अरबी के पत्तों से लेकर ताज़े, नरम परवल तक, सब कुछ बड़ी आसानी से मिल जाता है। बंगालियों के इस प्रवास ने मांग और आपूर्ति के सिद्धांत को चरितार्थ करने में एक अहम भूमिका निभाई। इन मोहल्लों से गुज़रते हुए आज भी सुबह-शाम चावल पकने की सोंधी महक आती है। कहीं लकड़ी की आंच पर ज़ीरे और मिर्च के पेस्ट में पक रही मछली के झोल की ख़ुशबू आती है। ऊपरी तौर पर शायद आप उस संघर्ष की गहराई का अंदाज़ा न लगा सकें, जिससे गुज़रकर ये बाज़ार आज यहाँ खड़े हैं। गुरुद्वारे के पास मछली बाज़ार स्थापित करना कोई मामूली चुनौती नहीं थी। स्वादों का यह संघर्ष असल में बँटवारे की एक गहरी टीस है, जिसने हमारी कितनी ही जानी-पहचानी चीज़ों को बदलकर रख दिया। अमृतसर से लगा पंजाब मूल रूप से कृषि प्रधान और शाकाहारी था। विभाजन के बाद पेशावर और रावलपिंडी से आए लोग अपने साथ मांसाहारी ज़ायक़े को इस पार ले आए। उस में ग्रांड ट्रंक रोड की धुनें भी आकर घुल-मिल गईं। इन मिले-जुले सुरों ने न केवल ‘बटर चिकन’ जैसे स्वादों को जन्म दिया, बल्कि भट्टी पर गरमा-गरम रोटियाँ सेंकने वाले ढाबे भी वजूद में आए। बंटवारे से पहले के पंजाब में, ‘सांझा चूल्हा’ का मतलब था सामुदायिक चूल्हा या एकल चूल्हा, जहाँ माएँ और बेटियाँ एक साथ मिलकर रोटियाँ सेकती थीं – ठीक वैसे ही जैसे बंगाली महिलाएँ मिलकर ‘पीठे’ बनाती हैं। फिर ये समुदाय बिखर गए। जब देश टूट जाए तो क़ौम भला कैसे अटूट रह सकती है! वही चूल्हा बाद में पुरुषत्व के सांचे में, ढाबे के रूप में लौटा। इसे भी खान-पान के प्रवासन (फ़ूड माइग्रेशन) का ही एक रूप कहना चाहिए।
मगर बात सिर्फ़ विभाजन की नहीं है! बंगालियों के पलायन के पीछे और भी कई कारण रहे हैं। इस संदर्भ में, ‘कवि कंकन चंडी’ के रचयिता मुकुंदराम चक्रवर्ती का उदाहरण हमारे सामने है। एक समय था जब डिहिदार (लगान वसूलने वाले अधिकारी) महमूद शरीफ़ के ज़ुल्मों से तंग आकर उन्हें वर्धमान ज़िले में स्थित अपना गाँव और पुश्तैनी ज़मीन छोड़कर भागने पर मजबूर होना पड़ा। रास्ते में, मुट्ठी भर भात के लिए उनका नन्हा बेटा बिलख रहा था। ये वर्धमान के लोग थे, उस मिट्टी के, जहाँ सोना उपजता था। क्या उस गाँव का कोई भात के लिए रो सकता था? पता नहीं यह सच था या नहीं, लेकिन वक़्त के साथ वर्धमान और हुगली के लोग अलग-अलग कारणों से विस्थापित होते रहे। तब तक बंगाल के गाँवों की लोरियों में ‘बरगियों’ (मराठा हमलावरों) के दहशत का साया मंडराने लगा था। लोगों का एक हुजूम अपना घर-बार और ज़मीन छोड़ कर जा रहे थे। आख़िर, वे सब कहाँ जा रहे थे? मुकुंदराम ‘आड़रा’ गाँव चले गए और बाक़ी लोग शायद मेदिनीपुर पार कर ओडिशा के कटक ज़िले के करालबंका गाँव जा बसे। चौदह पीढ़ी पहले अपना घर-बार छोड़ आए उन लोगों ने वहाँ अपनी एक अलग बिरादरी बसा ली। क्या पलायन वाक़ई किसी नए समुदाय को जन्म देता है! उत्तरजीविता का यह कितना अद्भुत तरीक़ा है! यह समुदाय आज भी वर्धमान शैली में खाना पकाता है, लेकिन ओडिशा के लोगों की तरह, ‘पाखाल भात’ (बासी भात) का भी उतना शौक़ीन है। उनके जाने के काफ़ी बाद में, पोस्तो (खसखस) वहाँ के खान-पान में इतना लोकप्रिय हुआ की उसे लेकर कई संघर्ष और विवाद जुड़े रहे। इसके बावजूद, अपनी जड़ों से जुड़े रहने की चाह में इस समुदाय ने अपनी रसोई में पोस्तो को एक ख़ास जगह दी। कुछ और न सही, कम से कम पाखाल भात के साथ पिसा पोस्तो खाकर, पीछे छूटी अपनी ज़मीन को महसूस तो किया ही जा सकता था। मगर, हर कोई अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ सब नहीं कर पाता है। हर वक़्त ऐसा होना मुमकिन भी नहीं होता। आख़िर बंगाली कोई वंशानुगत नस्ल नहीं, बल्कि एक भाषाई समुदाय है – उनका इतिहास कम अद्भुत नहीं! जिन्होंने परिमल भट्टाचार्य का हाल ही में प्रकाशित उपन्यास ‘सातगाँ’र हावाताँतिरा’ (सातगाँव के पवन-जुलाहे) पढ़ा है, वे यह बात जानते होंगे। और जो नहीं जानते, उन्हें बता दूँ कि इस उपन्यास में परिमल बाबू ने आदि सप्तग्राम, सरस्वती नदी और बंगाल के इतिहास की गहराइयों में दबी एक अद्भुत, जादुई ऐतिहासिक गाथा रची है। यह कहानी दैनंदिन जीवन और धर्म से लेकर रसोईघर तक की यात्रा को बड़ी सहजता से समेटे आगे बढ़ती है। इस महागाथा की सीमाएँ, दासों (ग़ुलामों) के व्यापार से लेकर चटगाँव के बंदरगाह तक फैली हुई हैं।
इसी संदर्भ में, नारायण गंगोपाध्याय का उपन्यास ‘पदसंचार’ याद आता है, जो बंगाल में पुर्तगालियों के आगमन की बात करता है। उपन्यास के संवाद मेदिनीपुर के ‘खेजुरी’ गाँव की याद दिलाते हैं, जहाँ आज भी पुर्तगाली मूल के लोग रहते हैं। काश! मैं किसी तरह उनके खान-पान के क़िस्सों का हिस्सा बन पाती! सिर्फ़ यह सोचकर ही मेरा मन रोमांच से भर उठता है। कहानियों का लालच भी बड़ी अजीब है; इन्हीं के आकर्षण में ही तो मैं एक रसोई से दूसरी रसोई भटकती रहती हूँ। आज इस तपती दोपहर में जब मैं ‘पटोले’र दोलमा’ (भरवां परवल) बना रही हूँ, तो मेरा मन बार-बार अरमेनियन चर्च की ओर खिंचा जा रहा है। पुरानी ढाका की गलियाँ, अर्मेनियाई ज़मींदारों के क़िस्से, या फ़राशगंज के हाट-बाज़ार से लिपटा हुआ इतिहास – क्या उसे ‘मटन/बीफ़ ग्लासी’ (ब्राउन स्टॉक से तैयार किया गया गाढ़ा और चाशनी जैसा शोरबा जिसे घंटों तक धीमी आंच पर उबाला जाता है) की ख़बर है? क्या आज की रसोइयों में इतिहास के लिए कोई जगह बची है? इसका कोई सटीक जवाब मेरे पास नहीं है, पर मैंने देखा है कि बांग्लादेश के लोग ईद की क़ुर्बानी के गोश्त को चर्बी में पकाकर संरक्षित रखते हैं। संरक्षण का यह तरीक़ा कभी अर्मेनियाई लोगों की देन था। जिस तरह ‘ग्लासी’ का प्रभाव आज भी क़ायम है, उसी तरह हमारी दादी-नानी, खाला और माँओं ने उस शैली को मछली के साथ प्रयोग कर एक नया रूप दे दिया है। शायद अर्मेनियाई लोगों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि बोआल या कैटफ़िश से भी ‘ग्लासी’ बनाई जा सकती है! इंसानों का पलायन उनसे वो सब करवा लेता है, जिनके बारे में उन्होंने कभी सोचा भी न हो। इसमें एक तरफ़ पीछे छूटे वतन को छू लेने की व्याकुलता झलकती है, तो दूसरी तरफ़ अपने वजूद को बचाए रखने की जद्दोजहद। यहाँ उनके आर्थिक हालात के साथ-साथ, इस उपमहाद्वीप में अपनी जातीय पहचान का मुद्दा भी बेहद ज़रूरी हो जाता है – और इसी जातीयता के ताने-बाने में रची-बसी होती हैं खाना पकाने की अलग-अलग तकनीकें।

पिछले कुछ वर्षों से हम लोगों से जुड़कर रसोई के बदलते स्वरूप को समझने की कोशिश कर रहे हैं। चाहे वे त्रिपुरा की मनसा मासी हों या सुभाषग्राम की कल्याणी दीदी। खान-पान की इस बदलती संस्कृति पर उनकी पकड़ मुझे और समृद्ध करती है। मैं बस उन सभी रेसिपीज़ को सीख लेना चाहती हूँ। इसीलिए, डिगलीपुर का बाज़ार घूमकर मैं आठ नंबर चावल खरीदती हूँ और उन गोल-गोल, सुडौल दानों से पायेश (खीर) बनाती हूँ। विस्थापन या प्रवास की उस भीतरी लय को महसूस करने के लिए ही मैं अक्सर इन अपरिचित स्वादों की ओर खिंची चली आती हूँ।
बस अब कुछ ही दिनों में बारिशें शुरू हो जाएंगी और लेमनग्रास की झाड़ियाँ घनी हो जाएंगी। तब मैं लेमनग्रास के डंठलों के साथ बर्मी इलिश(हिलसा)पकाऊंगी। जब प्रेशर कुकर की भाप के साथ उसकी मिली-जुली महक चारों ओर फैलेगी, तो रंगून की यादें ताज़ा हो जाएंगी। पर सिर्फ़ रंगून ही क्यों! मायाबंदर की बर्मा कॉलोनी हो या करेन आदिवासियों का गाँव ‘वेबी’, वहाँ के रसोईघरों में मैंने देखा है कि कैसे वे आज भी सौ सालों से सहेज कर रखे धान के बीजों से देसी चावल उगा रहे हैं। सुबह-सुबह चिपचिपे चावलों में नारियल का बुरादा और शहद मिलाकर नाश्ता करने की याद आज भी ताज़ा है। अमृतसर की मासी ने मुझे इलिश बनाने का एक नया तरीक़ा सिखाया था, उसकी ख़ुशबू आज भी मेरे रसोईघर में शहज़ादपुर की यादें ज़िंदा कर देती है।

देखा जाए तो इंसानों के साथ की यह निरंतर तलाश किसी ‘थ्योरी पेपर’ की तरह है। और जब हम शांतिनिकेतन के बल्लभपुर वाले अपने घर में उसी खान-पान को फिर से रचने की कोशिश करते हैं, तो वह किसी लैब में होने वाले ‘प्रैक्टिकल’ जैसा लगता है। मैं दावे से तो नहीं कह सकती कि रसोई को लैब कहा जा सकता है या नहीं, लेकिन अपनी रसोई में मिट्टी के बर्तन में उगाए चावल की कोपलों से जब मैं चटगाँव के उस पारंपरिक ‘पीठे’ को आकार देती हूँ, तो लगता है जैसे मैं इतिहास की गहराइयों को टटोल रही हूँ। इस मायने में, अपनी इस रसोई के ज़रिए मैं हर दिन नए लोगों से जुड़ रही हूँ और उनके रसोईघरों को क़रीब से जान रही हूँ। चाहे ‘गोदक’ बनाना हो या ‘तारिणी’ मछली का खट्टा झोल – मैं तो बस एक घुमक्कड़ छात्रा की तरह सब सीख रही हूँ। लोगों के साथ और इस भ्रमणशील जीवन के बिना यह संभव नहीं था। रसोई के इस निजी घेरे में मैं भोजन के नृविज्ञान से इसी तरह समझने की कोशिश करती हूँ। सच तो यह है कि हमारा दिमाग़ और हमारी स्वाद ग्रंथियाँ जिस तरह इतिहास को सहेजती हैं, उसका कोई मुक़ाबला नहीं।
अंडमान से त्रिपुरा तक के इस सफ़र में मैं बस वक़्त के उस प्रवाह को महसूस करती रही हूं। धीरे-धीरे मुझे अहसास हुआ है कि यही हमारा देश है, यही हमारा भारतवर्ष है। मनुष्यों का यह निरंतर गतिशील जीवन कभी थमने वाला नहीं है। यही इस धरती की वो प्राचीन गाथा है, जो हमारे हांडी-पतीलों पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाती है — एक ऐसी छाप, जो यादों के ज़रिए हमेशा ज़िंदा रहती है। फिर भी, यह चिंता अप्रासंगिक नहीं है – दुनिया ने वैश्वीकरण को जिस तरह अपनाया है, उसमें अब विविधता के लिए जगह कम होती जा रही है। डर है कि कहीं सब कुछ एक ही सांचे में न ढल जाए! अगर ऐसा हुआ, तो शायद हमारे भात की थाली से विस्थापन का वह इतिहास मिट जाए! फिर भी, मनुष्य का मन तो आख़िर अपनी जड़ों की ओर ही लौटता है; इसीलिए वह वैश्वीकरण की एकरूपता को पीछे छोड़कर मानवता की विजयी यात्रा की उस आदिम और मौलिक गाथा को जीना चाहता है। शायद हमारी रसोई भी ऐसा ही चाहती है।

*तस्वीरें लेखक के सौजन्य से
