Eating in Amritsar-Hindi
Volume 2 | Issue 3 [July 2022]
1955 में मेरे पिता नेत्रविज्ञान में पीएचडी कर रहे थे। उस दौरान वह इंग्लैंड में रह रहे थे। घर से दूर रहने के कारण उन्हें बेहद अकेलापन महसूस होता था, उन्हें अपने बच्चों की याद आती थी, साथ ही अपनी पत्नी के हाथ से बने खाने की भी। उन्हें कम मानदेय मिलता था, उसके बावजूद एम. एस. बेटॅरी नामक जहाज़ पर सवार होकर उनका परिवार उनके पास पहुँच गया। तब मैं चार साल की थी
— नीलम मानसिंह चौधरी
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